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कठुआ-उन्‍नाव रेप केस: ‘आप अकेले नहीं हैं मैं भी हूं’

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नई दिल्ली

आप अकेले नहीं हैं जिनके साथ ये हुआ है. ऐसे बहुत परिवार हैं. मैं भी हूं. हिम्‍मत रखें, उम्‍मीद को जिंदा रखें, संविधान में सजा है तो दोषियों को मिलेगी. मैं तो यही कहूंगी कि भगवान इस दुख को सहने के लिए कठुआ के परिवार और उन्‍नाव की पीड़ि‍ता को हिम्‍मत दे.छह साल पहले एक निर्भया हुई थी. आज कठुआ में एक निर्भया, उन्‍नाव की निर्भया. ये सब देख कर मेरी रूह कांप रही है. मैं निर्भया के लिए आज भी लड़ रही हूं लेकिन 6 साल में भी उसको इंसाफ नहीं मिला. आरोपियों को फांसी की सजा हुई, लेकिन अभी भी वे जिंदा हैं. बहुत तकलीफ होती है कठुआ और उन्‍नाव की घटनाओं पर.

मुझसे पूछिए मैंने कितने संघर्ष किए लेकिन मेरी बेटी को आज भी न्‍याय का इंतजार है. इन छह सालों में हालात और भी खराब हो गए हैं. अब कठुआ और उन्‍नाव में ऐसी घटनाएं. बहुत तकलीफ दे रही हैं.कठुआ में बच्‍ची मर गई लेकिन आरोपी खुले घूम रहे हैं. शर्म आ रही है कि लोग उन्‍हें बचाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. शायद इन लोगों के अंदर की आत्‍मा मर गई है. दुष्‍कर्म के आरोपियों को बचाने के लिए प्रदर्शन तो डूब मरने की बात है. ऐसे लोग इंसानों के नाम पर धब्‍बा हैं.

आरोपियों को बचाने के लिए प्रदर्शन करने वाले लोगों के घर में शायद बेटियां, मां-बहन नहीं हैं. कैसी निर्दयता से एक 8 साल की बच्‍ची के साथ रेप होता है और मार दिया जाता है और आरोपियों को बचाने के लिए राजनीति की जा रही है. यह सब देखकर बड़ा दुख होता है. किस शासन में जी रहे हैं हम? कैसी सरकारों के साथ हम जी रहे हैं?

बहुत खीझ होती है उन लोगों पर जो सरकार में नहीं होते तो महिलाओं को मुद्दा बनाकर खड़े होते हैं और कहते हैं कि महिलाओं और बच्चियों को सुरक्षा देंगे लेकिन जब सरकार में आ जाते हैं तो पीछा छुड़ा लेते हैं. जब तक सरकार में नहीं हैं तो महिलाओं के लिए झंडा लेकर खड़े होते हैं, लेकिन आज कोई इन घटनाओं पर बोल तक नहीं बोल रहा, इंसाफ तो दूर की बात है.

आठ साल की बच्‍ची के साथ 7-7 लोगों ने रेप किया लेकिन एक भी दोषी की गिरफ्तारी नहीं हुई. सरकार आरोपियों को बचा रही है. पुलिस भी इसमें शामिल है. सरकारों का वोट बैंक बचा रहे. महिलाएं मरें या जिएं इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है.हम कहते हैं हमारा समाज बदल जाए, हमारा सिस्‍टम बदल जाए, लेकिन हमारे राजनेता भी बदल जाएं तो महिलाओं की सुरक्षा वैसे ही हो जाएगी.

मुझे बहुत ग्‍लानि होती है कि आज सबकुछ बड़ी-बड़ी चीजें हो रही हैं. लेकिन महिलाओं के मुद्दे पर किसी भी नेता की आवाज नहीं निकलती. दो दिन से देख रही हूं कि दोनों जगह के दोषियों को बचाने के लिए पूरी कायनात लग गई है.उन्‍नाव में देखिए- एक बेटी अपनी अस्‍मत खोकर इंसाफ के लिए लड़ रही है अपने बाप के लिए तड़प रही है. उसके बाप को भी मार डाला. लेकिन सरकार आरोपी को बचा रही हैं.

यही सरकार तो अभियान चलाती है बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ, बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार. कहां गई सरकार, कहां गया नारा ? लेकिन नेता हैं तो उन्‍हें बचाने के लिए पूरी की पूरी सरकार खड़ी है. कोई कह रहा है कि सबूत नहीं है. अरे इससे बड़ा क्‍या सबूत है कि एक बाप अपनी बेटी के लिए न्‍याय मांगने गया तो उसे जेल में बंद कर मार डाला गया.

कोई कह रहा है कि तीन बच्‍चों की मां के साथ रेप नहीं हो सकता. मैं पूछती हूं 70 साल की बुढ़ि‍या के साथ रेप हो सकता है, 8 साल की बच्‍ची के साथ रेप हो सकता है, तो तीन बच्‍चों की मां के साथ रेप कैसे नहीं हो सकता?हमारे देश में तो महिलाओं की कोई कद्र नहीं है. मर्दों को तो महिला चाहिए, चाहे 8 महीने की बच्‍ची हो या 70 साल की बुढ़‍िया. ऐसे लोगों को संरक्षण देने वाली सरकारों को तो डूब मरना चाहिए. अपनी कुर्सी छोड़ देनी चाहिए कि इनके वश का कुछ नहीं है.

आज हम इंसाफ मांगने जाते हैं तो हमें 10 कानून सिखाए जाते है कि कानून के अनुसार सजा मिलेगी. मानवाधिकार का हनन हो रहा है. आज आरोपियों को खुलेआम बचाया जा रहा है क्‍या ये मानवाधिकार का हनन नहीं हो रहा है ?

मैं तो ये कहती हूं कि अगर संविधान में सजा है और सबके लिए है तो अपराध करने वाले को सजा दो, नहीं तो इस संविधान को खत्‍म कर दो. जिसकी सरकार है उसी का राज है, फिर तो जो मर्जी करे. अगर गरीब जाएगा तो उसे संविधान सिखाया जाएगा और अमीर जाएगा तो सरकार बचा लेगी तो एेसे संविधान का क्‍या फायदा?

कठुआ की बेटी के मां-बाप को बहुत कठिनाइयां झेलनी पड़ेंगी. मैंने कितना झेला है. पिछले साल मई में फैसला आया था फांसी का लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में दो महीने से तो तारीख भी नहीं पड़ रही है. फिर ऐसे ही दो-तीन साल गुजर जाएंगे.

रेप करके जब लोग पुलिस और कोर्ट में जाते हैं तो हमारी सरकारों को उनपर दया आ जाती है और उन्‍हें बचाने के लिए बड़े-बड़े लोग आ जाते हैं. हमें तो इंसाफ सिर्फ कागजों में मिला है. जब तक उनको फांसी नहीं मिल जाती तो किस बात की सजा? कठुआ के पीड़ि‍तों को भी कठिनाइयां झेलनी पड़ेंग

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