Home राजनीति कर्नाटक का असर: क्या बीजेपी के मिशन 400 के लिए चुनौती होगा...

कर्नाटक का असर: क्या बीजेपी के मिशन 400 के लिए चुनौती होगा साउथ?

0 31 views
Rate this post

नई दिल्ली

कर्नाटक में शनिवार को बहुमत परीक्षण से ठीक पहले जब महज दो दिन पहले येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो इससे बीजेपी की दक्षिण भारत की मुहिम को भी झटका लगा। कांग्रेस और जेडीएस प्लस के गठबंधन ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बावजूद बीजेपी को कर्नाटक की सत्ता में काबिज होने से रोक दिया। कर्नाटक में अब सीएम बनने जा रहे कुमारस्वामी ने कांग्रेस-जेडीएस के इस गठबंधन को देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए एक प्लैटफॉर्म बताते हुए कहा कि इसी वजह से वह सीएम बनने को तैयार हुए। ऐसे में 2019 के चुनावों से ठीक पहले दक्षिण भारत के एक अहम राज्य में बीजेपी की इस हार को उसके मिशन 2019 के लिए झटके के तौर पर भी लिया जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी के मिशन 400 के सामने दक्षिण भारत चुनौती पेश करेगा?

कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल साउथ के 4 राज्यों में बीजेपी सत्ता में नहीं है। दक्षिण के 5 राज्यों में से केवल कर्नाटक ही ऐसा सूबा है जहां से 2014 में बीजेपी को अच्छी जीत मिली (28 में से 17 सीटें) थी। यूनाइटेड आंध्र प्रदेश में बीजेपी को 3 सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट शेयर 8.5 फीसदी रहा था। हालांकि 4 सालों में यहां की राजनीतिक तस्वीर काफी बदल चुकी है। आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं। तब से वह बीजेपी को लेकर काफी आक्रामक भी हैं। उन्होंने कर्नाटक की तेलुगु जनता को बीजेपी के खिलाफ वोट करने की अपील भी की थी।

आंध्र प्रदेश: क्या बीजेपी के लिए मुश्किलें?
क्या नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) बीजेपी के खिलाफ अन्य पार्टियों को एकजुट करेगी? आंध्र के एमएलसी केशव का कहना है कि 2019 के गठबंधनों के लिए भी बात करना जल्दबाजी होगी (आंध्र में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी होंगे)। केशव का कहना है कि आंध्र में टीडीपी के लिए बीजेपी कोई खतरा नहीं है कि क्योंकि उसका राजनीतिक आधार नहीं है। बीजेपी नेता राम माधव का ट्वीट भी इस लिहाज से अहम है। उन्होंने लिखा कि कर्नाटक में टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू ने तेलुगु वोटर्स को बीजेपी का सपॉर्ट करने से रोकने के लिए सारे प्रयास किए। लेकिन हैदराबाद कर्नाटक जहां ज्यादातर तेलुगु लोग रहते हैं, बीजेपी ने अपनी सीटों की संख्या 6 से बढ़ाकर 20 की है। राम माधव ने लिखा कि दक्षिण की ओर बीजेपी का मार्च शुरू हो गया है।

हालांकि आध्र इंटेलेक्चुअल्स फोरम के मुखिया चलासनी श्रीनिवास राव माधव के बयान को खारिज करते हैं। उन्होंने बताया कि चिकबल्लापुर, कोलार और बेंगलुरु ग्रामी जहां ज्यादा संख्या में तेलुगु लोग रहते हैं, बीजेपी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। उनका कहना है कि आध्र के लोग बीजेपी को पाठ पढ़ाएंगे और आंध्र व तेलंगाना में बीजेपी अपने बूते 2-3 फीसदी से अधिक वोट नहीं पाएगी।

तेंलगाना: नए फ्रंट को लेकर सुगबुगाहट
तेंलगाना की स्थिति थोड़ी अलग है। सीएम चंद्रशेखर राव देश में नॉन बीजेपी नॉन कांग्रेस फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 2019 पर नजर रखते हुए उनकी मुलाकात देवगौड़ा, स्टालिन और ममता बनर्जी से हो चुकी है। हालांकि कोई तस्वीर साफ नहीं हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि तेलंगामा में राव की टीआरएस के लिए बीजेपी से बड़ा खतरा कांग्रेस है। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां टीआरएस को 63 सीटें, कांग्रेस को 22 और बीजेपी को 9 सीटें मिली थीं। जेडीएस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया है। ऐसे में ऐंटी कांग्रेस फेडरल फ्रंट में उसका जाना संभव नहीं लगता।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस के पूर्व प्रफेसर जी हरगोपाल के मुताबिक बहुतों को ऐसा लगता है कि राव की यह कवायद क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के खिलाफ करने की बीजेपी की साजिश का हिस्सा है। हालांकि कर्नाटक के हालिया राजनीतिक संकट के दौरान केसीआर ने भी कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को अपने यहां सुरक्षित रखने का प्रस्ताव दिया था।

तमिलनाडु: बीजेपी के लिए राह कठिन
कथित तौर पर प्रो हिंदी-हिंदू और ऐंटी तमिल की छवि, तमिलनाडु में बीजेपी की राह को मुश्किल बना रही है। 2014 में एआईएडीएमके ने लोकसभा में सबको साफ कर दिया था। बीजेपी को केवल एक सीट मिली थी। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर और घटकर 2.86 फीसदी पर पहुंच गया। पिछले दिनों तमिलनाडु गए पीएम मोदी को कावेरी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन भी झेलना पड़ा।

तमिलनाडु की वर्तमान एआईएडीएमके सरकार को परोक्ष रूप से बीजेपी का समर्थन है। डेप्युटी सीएम पन्नीरसेल्वम मान भी चुके हैं पीएम मोदी के सुझाव पर ही एआईएडीएमके के दो धड़ों का मेल हुआ था। हालांकि डीएमके का कहना है कि तमिलनाडु में बीजेपी का कोई बेस नहीं है। फेडरल फ्रंट को लेकर केसीआर और स्टालिन की मुलाकात पर डीएमके का कहना है कि केंद्र के लिए बन रहे फ्रंट से कांग्रेस को हटाना मुश्किल है। डीएमके के प्रवक्ता का कहना है कि कांग्रेस की क्षेत्रीय दलों के साथ एक ऐसी समझ बननी चाहिए कि वह उन्हें विधानसभा चुनावों में समर्थन दे और आम चुनावों में उनका समर्थन हासिल करे।

केरल: राइट बनाम लेफ्ट की लड़ाई
सीपीएम के शासन वाले केरल के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना खाता खोलने में सफलता हासिल की थी। अब इस प्रदेश पर बीजेपी की नजर है। पार्टी ने हाल के सालों में यहां अपनी उपस्थिति को मजबूत बनाया है। बीजेपी यहां 2006 में 4.75 फीसदी वोट शेयर से 2016 में 15 फीसदी से अधिक वोट पाने वाली पार्टी बनी है। 28 मई को होने वाले चेंगन्नूर उपचुनाव में सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, कांग्रेस के युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला होगा। यहां बीजेपी के उभार को काउंटर करने के लिए सीपीएम ने भी ताकत झोंक रखी है।

हालांकि केसीआर की तरफ से फेडरल फ्रंट की कोशिशों के बावजूद अबतक बीजेपी के खिलाफ दक्षिण में कोई संयुक्त विपक्ष नहीं दिख रहा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यहां अगर विपक्ष की एकजुटता दिखती भी है तो सबके अपने निजी फायदों और शॉर्ट टर्म स्ट्रैटिजी की ही तौर पर दिखती है। इसके अलावा कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर भले कर्नाटक का अपना गढ़ बचा लिया है लेकिन बहुमत नहीं हासिल करने पर राहुल गांधी के नए नेतृत्व पर सवाल बना हुआ है। आंध्र-तेलंगाना में जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और पवन कल्याण की जनसेना जैसे राजनीतिक दलों ने भी अभी अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। ऐसे में 2019 की लड़ाई किस करवट बैठेगी इसे लेकर फिलहाल राजनीतिक अटकलें ही लगाई जा सकती हैं।

दोस्तों के साथ शेयर करे.....