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कर्नाटक चुनाव रिजल्ट: क्या करेंगे राज्यपाल, क्या है इतिहास …

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बेंगलुरु

अभी तक कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के लिए रातों की नींद दांव पर लगाकर जुटे रहे राजनीतिक दलों के नेता मंगलवार को नतीजे आ जाने के बाद भी सो नहीं सके होंगे। चुनाव के नतीजे ऐसे आंकड़ों पर आकर ठहर गए हैं कि एक चाल से ही तस्वीर बदल सकती है लेकिन तस्वीर बदलने का सबसे बड़ा अधिकार जिसके पास है, वह एक शख्स क्या कर सकता है, इस बारे में एक्सपर्ट्स की राय बंटी हुई है।

कर्नाटक में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल सेक्युलर के समर्थन से सरकार बनाने की जुगत में लगी कांग्रेस में से किसे सरकार बनाने के लिए न्योता देना है, इसका फैसला राज्यपाल वजुभाई आर वाला करेंगे। एक्सपर्ट्स की मानें तो अब तीन संभावनाएं बनती हैं-

गोवा, मणिपुर की तर्ज पर मिले न्योता
कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिस तरह गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के बाद कांग्रेस ने सरकार बनाने की पेशकश की थी, बीजेपी को भी वही तर्क सामने रखना चाहिए। दोनों राज्यों में कांग्रेस को ज्यादा वोट मिलने के बावजूद बीजेपी ने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।

सबसे बड़ी पार्टी को मिले न्योता
पूर्व अटर्नी जनरल सोली सोराबजी का मानना है कि पहले सबसे बड़ी पार्टी को न्योता दिया जाना चाहिए। सदन के फ्लोर पर वह 7 से 10 दिन में अपना बहुमत साबित करे। अगर वह पार्टी बहुमत साबित नहीं कर सकी तब अगली सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को न्योता दिया जाना चाहिए। अगर वह भी बहुमत साबित नहीं कर सके, ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए।

राज्यपाल के विवेक पर सब निर्भर
कई तरह के तर्कों से हटकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार बनाने का न्योता देने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक के आधार पर दिया है। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का कहना है कि राज्यपाल को किसी भी पार्टी, चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को न्योता देना होता है, अगर वह इस बात से संतुष्ट हैं तो जिसे वह न्योता दे रहे हैं, वे सदन में बहुमत साबित कर सकेंगे।

यहां तक कि यह माना गया है कि राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है लेकिन फिर भी उनसे यह अधिकार छीना नहीं गया है। हालांकि, बहुमत सदन में फ्लोर पर ही साबित करना होगा।जस्टिस आरएस सरकारिया कमिशन ने इस बारे में विकल्पों और उनकी प्राथमिकता को चिह्नित किया है लेकिन साथ ही राज्यपाल के खुद के फैसले को भी अहम बताया है।

कौन होगा मुख्यमंत्री?
कर्नाटक की स्थिति पर कश्यप ने बताया कि कैसे पहले के कई उदाहरणों से कर्नाटक की संभावनाओं को समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है या चुनाव के बाद गठबंधन होने पर उसके किसी नेता को भी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

इस बारे में भी राज्यपाल अपने विवेक से फैसला कर सकते हैं क्योंकि संविधान में जोड़-जोड़ कर सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी है, इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। सरकारिया कमिशन ने किसी एक पार्टी या चुनाव से पहले बने गठबंधन को बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री चुनने के लिए पार्टियों की प्राथमिकता इस तरह तय की है-

1. चुनाव से पहले बना गठबंधन।
2. निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनाने की पेशकश करने वाली सबसे बड़ी पार्टी।
3. चुनाव के बाद बना गठबंधन जिसमें सभी दल मिलकर सरकार बनाएं।
4. चुनाव के बाद बना गठबंधन जिसमें कुछ दल सरकार बनाएं और बाकी बाहर से समर्थन दें।

कमिशन ने यह साफ किया है कि इन प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल को अपने विवेक के आधार पर उस नेता को चुनना होता है जो उनके विचार में सदन में बहुमत साबित कर सके।

बिहार चुनाव 2006: चिह्नित हुईं राज्यपाल की ताकतें
हालांकि, राज्यपाल के पास अपने विवेक के आधार पर फैसला करने का अधिकार है, 2006 के बिहार चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एक बार बहुमत के आंकड़े को लेकर आश्वस्त होने के बाद राज्यपाल के पास किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता देना ही होता है, चाहे गठबंधन चुनाव से पहले बने या बाद।

‘जोड़-तोड़ में कुछ गलत नहीं’
पांच जजों की बेंच ने कहा था कि अगर दो पार्टियों में वैचारिक समानता हो तो चुनाव के बाद जोड़-तोड़ करने में कुछ गलत नहीं है। कोर्ट ने कहा था, ‘अगर कोई पार्टी किसी अन्य पार्टी या विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा करती है और स्थिर सरकार बनाने को लेकर राज्यपाल को संतुष्ट करती है तो राज्यपाल सिर्फ इस आधार पर उसे खारिज नहीं कर सकते कि बहुमत का आंकड़ा गलत तरीकों से हासिल किया गया। राज्यपाल के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है। ऐसी ताकत देना लोकतंत्र में बहुमत के सिद्धांत के विरुद्ध होगा।’ कोर्ट ने यहां तक कहा कि इस तरह की ताकत राज्यपाल को देने के भयानक परिणाम हो सकते हैं।

राज्यपाल ने की थी विघटन की सिफारिश
गौरतलब है कि 2006 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने बिहार असेंबली का विघटन करने की सिफारिश की थी क्योंकि उन्हें लगा था कि चुनाव से पहले बना बीजेपी और जनता दल (यूनाइटेड) का गठबंधन (92 सीट) राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी (75+29 सीट) को बहुमत का आंकड़ा बनाने से रोकने की कोशिश कर रहा है। सिंह के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में रामेश्वर प्रसाद ने चुनौती दी थी। कोर्ट ने बूटा सिंह को फटकार लगाते हुए राज्यपाल की ताकतों के बारे में फैसला दिया था।

दोबारा चुनाव किए थे खारिज
बिहार मामले में जब कोर्ट के सामने यह तर्क रखा गया कि जोड़-तोड़ की जगह दोबारा चुनाव कराने चाहिए तो तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वाई के सबरवाल ने कहा था कि इस प्रस्ताव को मानने से सदन के विघटन के रास्ते आसान हो जाएंगे जिसके दूरगामी, चिंताजनक और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।

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