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बीएसपी को मिले इस ‘गिफ्ट’ से बीजेपी को टेंशन

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लखनऊ

यूपी की सत्ता से बेदखल होने के कई साल बाद बीएसपी की सुप्रीमो मायावती प्रत्यक्ष रूप से किसी और राज्य में सत्ता का हिस्सा बनी हैं। ऐसा संभव हुआ है कांग्रेस की ‘दरियादिली’ से। कर्नाटक में बीएसपी के इकलौते विधायक एन. महेश भी कुमारस्वामी सरकार में मंत्री बनाए गए हैं। कांग्रेस की नजर मायावती के इस ‘इक्के’ को साधकर तीन राज्यों में बीजेपी को पटखनी देने पर है, जहां बीएसपी का साथ निर्णायक हो सकता है।

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह का मंच विपक्षी एकता की सबसे बड़ी नुमाइश के तौर पर पेश किया गया था। इस दौरान जो सर्वाधिक चर्चा में रहा, वह था यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और बीएसपी सुप्रीमो मायावती के मिलने का अंदाज। इस मुलाकात ने जहां राष्ट्रीय राजनीति में मायावती की अहमियत को फिर साबित किया था, वहीं कांग्रेस को अपनी उम्मीद भी और मजबूत होती दिखी। हालांकि, लखनऊ आते ही मायावती ने एक बार फिर अपने तेवरों से कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी थी। इसलिए जल्द कांग्रेस के पास इसका समाधान तलाशने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

सफल रही माया की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’
कर्नाटक में जेएडीएस और कांग्रेस अपने दम पर ही सत्ता के सुविधाजनक आंकड़े पूरे कर चुके थे। इसलिए सरकार में बीएसपी के रहने या न रहने से कोई तात्कालिक फर्क नहीं पड़ता। मायावती भी इस बात को जानती थीं। इसलिए लखनऊ आने के बाद पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पहली बैठक में ही मायावती जितना बीजेपी पर हमलावर रहीं, उससे कम निशाना कांग्रेस पर भी नहीं साधा।

भाई आनंद को उपाध्यक्ष पद से हटाने के लिए परिवारवाद का इकलौता उदाहरण मायावती ने कांग्रेस का ही रखा था। साथ ही दूसरे राज्यों में भी गठबंधन के लिए सम्मानजनक सीटों की शर्त रख दी। मायावती की यह ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ काम कर गई और उनके इकलौते विधायक को भी कर्नाटक में सरकार का हिस्सा बनाना पड़ा।

‘हाथ’ के लिए इसलिए अहम है ‘हाथी’
अगले कुछ महीनों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में दलित वोटर प्रभावी संख्या में हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीएसपी के ‘खत्म’ होने के मिथ को मायावती तोड़कर मजबूत मनोवैज्ञानिक वापसी कर चुकी हैं।गोरखपुर और फूलपुर में समर्थन के ऐलान भर से ही सियासत बदलकर मायावती साबित कर चुकी हैं कि दलित वोटरों के लिए अब भी उनके इशारे के क्या मायने हैं? वहीं, कांग्रेस के लिए इन तीनों राज्यों के चुनाव मोदी की अगुआई में बीजेपी को रोकने के लिए ‘नॉकआउट’ सरीखे हैं।

महागठबंधन की ‘कमजोर’ कड़ी
कांग्रेस ने इन राज्यों में बीजेपी को रोक दिया तो 2019 में गठबंधन की अगुआई उसके हाथ में होगी। ऐसा नहीं हुआ तो वह प्रस्तावित महागठबंधन की ‘कमजोर’ कड़ी के तौर पर देखा जाएगा। यही वजह है कि यूपी विधानसभा चुनाव में सहयोगी रही सपा के मध्य प्रदेश में गठबंधन के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने बिलकुल दिलचस्पी नहीं दिखाई।पार्टी को यह भी लगता है कि अगर कर्नाटक में बीएसपी का साथ उसे मिला होता तो शायद सीटों के आंकड़े कुछ और होते। कांग्रेस इस ‘शायद’ को बाकी राज्यों के लिए नहीं छोड़ना चाहती।

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