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मठ, दलित और मुस्लिम: ऐसे वोटरों को लुभा रही हैं बीजेपी और कांग्रेस

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नई दिल्ली

कर्नाटक चुनाव में जातिगत समीकरण बेहद अहम रोल निभाने वाले हैं। कर्नाटक चुनावों को अब लगभग एक महीना बाकी है। राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है। दोनों पार्टियों के मुखिया पिछले कुछ हफ्तों से राज्य में ताबड़तोड़ चुनावी दौरे कर रहे हैं। वोटरों को रोड शो और रैली के जरिए लुभाने के साथ-साथ राहुल गांधी और अमित शाह का मुख्य फोकस धार्मिक मठों, मंदिरों और जातियों के प्रमुखों से मिलना है। इनमें वोक्कालिगा, लिंगायत और कई अन्य समुदाय भी शामिल हैं। बिजली, पानी, सड़क, बिजली, शिक्षा और जॉब जैसे विकास कार्य के मुद्दों पर बात करने की जगह दोनों पार्टियां जातिगत समीकरणों को साधने में लगी हैं। राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में वोटर अपने धार्मिक नेता और मठों को ज्यादा मान्यता देते हैं।

एक सीनियर कांग्रेस नेता ने कहा, ‘सैकड़ों जाति आधारित मठों, प्रमुख समुदायों के अनुयायियों का एक समूह है। इनमें लिंगायत, वोक्कालिगा, कुरुबास और दलित के अलावा कई अन्य शामिल हैं। कोई भी राजनीतिक पार्टी इन्हें नजरअंदाज करने का रिस्क नहीं उठाना चाहेगी।’ इसके अलावा उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा जाति विभाजन इतने गहरे होते हैं कि किसी विशिष्ट जाति के कुछ संत ने खुद को नेताओं या पार्टियों के साथ जोड़ा है। इसलिए राजनीतिक पार्टियां उन सभी समुदायों के बेहद करीब दिखने की कोशिश कर रही हैं।’

कांग्रेस पार्टी के लिंगायत और वीरशैव लिंगायतों को अल्पसंख्यकों का दर्जा देने फैसले के बाद से ही चुनावी मौसम की शुरुआत हो गई थी। कर्नाटक में लिंगायतों की संख्या करीब 17 प्रतिशत है। यह कदम कांग्रेस के लिए बड़ा फैसला साबित हो सकता है। खबरें हैं कि लिंगायत समुदाय लोगों के साथ बैठक कर आने वाले चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने की बात कही है।

चित्तदुर्गा मुरुघा मठ के शिवमूर्ति मुरुघा राजेंद्र स्वामी ने कहा, ‘हम एक गैर-राजनीतिक फोरम हैं। हम लोग चुनावी राजनीति में शामिल नहीं होना चाहते हैं, लेकिन हम लोगों ने उनका समर्थन करने का फैसला किया है, जो हमें समर्थन दे सकते हैं।’ बसावा धर्म पीठ के माठे महादेवी ने खुले तौर पर कांग्रेस को समर्थन की बात करते हुए कहा, ‘मैं व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस का समर्थन करता हूं और लिंगायत समुदाय से भी कांग्रेस का समर्थन करने की अपील करता हूं।’

बता दें कि सिद्धारमैया सरकार की तरफ से लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है, लेकिन केंद्र सरकार ने फिलहाल इस पर कोई फैसला नहीं लिया है।

साथ ही वोक्कालिगा समुदाय भी दक्षिणी कर्नाटक में काफी अहम समुदाय है। राज्य की कुल आबादी का 8 प्रतिशत यही समुदाय है। इस फैसले इस समुदाय के लोगों में सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ नाराजगी है। ऐसे में राज्य की एक और पार्टी जेडीएस ने सिद्धारमैया सरकार के इस फैसले के बाद वोक्कालिगा समुदाय को एकजुट करने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषक मुजफ्फर एच असादी का कहना है, ‘जो भी लोग पूर्व पीएम देवगौड़ा और उनके बेटे के विरोध में है वह वोक्कालिगा के भी विरोध में है। ऐसे में वोक्कालिगा समुदाय के लोग सिद्धारमैया सरकार को सबक सिखाने का फैसला कर सकते हैं।’

कर्नाटक में लागू होने वाली आचार संहिता कहती है कि राजनीतिक दलों को जाति या धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगनी चाहिए, हालांकि राहुल गांधी और अमित शाह के मंदिरों और मठों में दौरे कुछ और ही कह रहे हैं। इन दौरों से साफ है कि दोनों पार्टियां जातिगत समीकरणों में कहीं भी फेल नहीं होना चाहती हैं।

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