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मामला टीएसडी में मटेरियल सप्लाई का

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भोपाल

कारखाने के टीएसडी विभाग में मनमाने ढंग से मटेरियल सप्लाई का मामला चर्चाओं में है। इस विभाग के बड़े साहब के एक खास अफसर बिना अपू्रवल के मटेरियल खरीदने में लगे हुए हैं जबकि इसके लिए अपू्रवल लेना जरूरी है। चर्चा है कि साहब के चहेते अफसर भले ही सप्लायर को बेहतर क् वालिटी का मटेरियल दिया हो लेकिन यदि साहब खुश नहीं है तो दो फीसदी से पांच फीसदी तक डिडेक्शन कर दिया जाता है। डिस्को सिटी हाई होने पर भी कंपनी को फायदा होने वाले मटेरियल का भी डिडेक् शन किया जाता है।

मजेदार बात यह है कि यदि किसी सप्लायर का मटेरियल टेस्टिंग में फेल भी हो जाता है तो उसका सेम्पल तीन से चार बार तक रि-टेस्ट कराया जाता है वह भी साहब की कृपा पात्र का। इसके चलते सप्लायर के बल्ले-बल्ले हो जाते है। यहां एक अफसर के यह हाल है कि वह भले ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियर से हो लेकिन बड़े साहब की मेहरबानी से केमीकल्स इंजीनियरिंग के हेड बने हुए है। यहां पैंट खरीदी का मामला विभाग में काफी चर्चाओं में है। चर्चा है कि इसकी परचेज वेल्यू का आकलन किया जाये तो पता चलेगा कि इस मटेरियल से भेल को काफी चूना लग रहा है।

काम करे वर्कर वाहवाही लूटे साहब

कारखाने बुसिंग के केपीसिटर एवं स्ट्रुमेंट्स विभाग में भी एक साहब ऐसे है जो खुद तो कुछ नहीं कर पाते लेकिन वाहवाही लूटने में मास्टर है। दरअसल बीसीएम-सीपीएम स्ट्रुमेंट्स में सीटी-सीवीटी टेस्ट में सारे काम वर्कर व निचले स्तर के अधिकारी करते है और साहब वाहवाही लूटते है। चर्चा है कि साहब को यहां के काम का ज्यादा अनुभव तो है नहीं फिर भी यह विभाग मिलने से काफी खुश है।उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि इसी सेक् शन में खुले में स्प्रे पैंट कराने से कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उस पर सेफ्टी विभाग मूक दर्शक बना हुआ है। जबकि पुराने टीसीबी विभाग को करोड़ों रूपये खर्च कर बनाया गया था वहां भी पैंट कराया जा सकता है। फिर खुले में क्यों कराया जा रहा है। इधर सीआईएम विभाग में इन्सुलेशन एक्सपर्ट खुद तो कोई निर्णय नहीं ले पाते उस पर आईएसई की टीम भी सक्षम नहीं बताई जा रही है। यहां के हेड इलेक्ट्रिकल्स के एक्सपर्ट हैं। यह विभाग जवाबदारी वाला माना जाता है। अनुभवी न होने के कारण काम की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ रहा है।

डिप्टी मैनेजर डिप्रेशन में

मटेरियल मेनेजमेंट विभाग(स्टील) के एक डिप्टी मैनेजर की डिप्रेशन में चले जाने की खबर है। दरअसल मामला जो भी हो लेकिन यह डिप्टी मैनेजर काबिल बताये जा रहे है, पहले भेल के प्रशासनिक भवन के सेकंड फ्लोर के एएसएक्स विभाग में बेहतर काम कर रहे थे इनके काम की सभी तारीफ करते नहीें थकते थे। प्रबंधन ने आनन-फानन में इनके विभाग में फेरबदल करते हुए एमएम स्टील भेज दिया। चर्चा है कि कुछ लोगों ने इन पर गलत काम करने का कुछ इस तरह का प्रेशर बनाया कि वह डिप्रेशन में चले गये। वैसे भी एमएम के कॉपर और स्टील के काम पहले भी काफी चर्चाओं में रहे। यहां नामी सप्लायर ही सप्लाई का काम करते हैं। वैसे तो यह विभाग भेल में मलाईदार माना जाता है। यहां के कुछ अधिकारी-कर्मचारी ज्यादातर तनाव में ही रहते है। इधर टीसीबी भी कम चर्चाओं में नहीं है। नये और पुराने विभाग में किट सप्लाई का मामला चर्चाओं में है। भले ही किट बाहर से आती है लेकिन आधी-अधूरी होने के कारण ज्यादातर काम कर्मचारियों को ही करना पड़ता है तो ऐसे में क् वालिटी के लोग सप्लाई के पहले कैसी क् वालिटी चेक करने जाते है इस पर सवालिया निशान लग गया है। साफ जाहिर है कि कहीं न कहीं भेल को चूना लगाने की कोशिश तो नहीं की जा रही है।

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