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मौका देख क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को विपक्षी एकता का धर्म समझाया

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नई दिल्ली

कर्नाटक में मंगलवार को जब वोटों की गिनती चल रही थी तभी टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कांग्रेस को नसीहत दी कि अगर जेडीएस से पहले गठबंधन किया होता तो बड़ी जीत मिलती। फिर उसी दिन देर शाम होते-होते बाकी क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने भी उनकी बात पर हामी भर दी। परिणाम आने के बाद दो दिन बाद बारी थी बीएसपी सुप्रीमो मायावती की। उन्होंने गुरुवार को कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस का जेडीएस को बीजेपी की बी-टीम कहकर आरोप लगाना गलत था और इससे बीजेपी को फायदा हुआ।

मायावती के बयान के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने फिर उनकी बात को सपॉर्ट किया। सूत्रों के अनुसार कर्नाटक में परिणाम के बाद जेडीएस नेता और पूर्व पीएम देवगौड़ा ने एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से बात कर इस बात को लेकर अपनी नाराजगी जतायी थी। इतना ही नहीं, आगे ऐसा न हो, इस बारे में कांग्रेस की ओर से आश्वस्त किए जाने के बाद ही गठबंधन की बात आगे बढ़ी। कर्नाटक में जेडीएस के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन के बाद अब संकेत साफ है कि विपक्षी एकजुटता आगे बढे़गी जिसमें कांग्रेस की बारगेनिंग की क्षमता कम हो जाएगी।

पहली परीक्षा तीन राज्यों में
सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी गठबंधन के बीच कांग्रेस को जगह मिलेगी या नहीं, यह साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद तय होगा। इन तीनों राज्यों में बीएसपी की मौजूदगी संक्षिप्त लेकिन प्रभावी है। कई सीटों पर इनके वोट परिणाम को प्रभावित कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार बीएसपी की कोशिश है कि तीनों राज्यों में कांग्रेस से वह कुछ सीट हासिल करे।

इन तीनों राज्यों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी ताकत है। अगर कांग्रेस ने बीएसपी को सीट दी तो फिर उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को लोकसभा की 80 सीटों में हिस्सा मिल सकता है। क्षेत्रीय नेताओं का मानना है कि 2019 से पहले विपक्षी एकता का स्वरूप क्या होगा, इस बारे में अब कांग्रेस को पहल करनी है और संकेत साफ है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों को नजरअंदाज कर कांग्रेस बीजेपी को हराने के बारे में सोच भी नहीं सकती है।

कांग्रेस में भी दो तरह के स्वर
2019 में विपक्षी एकता की बात को किस तरह आगे बढ़ाया जाय, इस बारे में कांग्रेस में शुरू में दो तरह के स्वर रहे हैं। एक तर्क यह रहा है कि कांग्रेस को सिर्फ उन्हीं राज्यों पर फोकस करना चाहिए जहां उसकी सीधी टक्कर बीजेपी से हो। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की सहायता में ऊर्जा लगानी चाहिए लेकिन दूसरा तर्क क्षेत्रीय दलों से मजबूत डील की मांग कर रहा है जिससे क्षेत्रीय क्षत्रप इनकार करते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद अब इस मसले पर बहस और आगे बढ़ेगी।

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