Home फीचर सरकार को मिला ‘मौका’, कलीजियम व्यवस्था को यूं देगी चुनौती?

सरकार को मिला ‘मौका’, कलीजियम व्यवस्था को यूं देगी चुनौती?

0 30 views
Rate this post

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों की ओर से चीफ जस्टिस के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद सरकार और राजनीतिक गलियारों में विभाजित कलीजियम की सिफारिशों को लेकर प्रेजिडेंशल रेफरेंस की संभावना पर चर्चा छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के 4 सीनियर जजों जस्टिस जे. चेलामेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ ने शुक्रवार को चीफ जस्टिस पर जो हमला बोला, उसकी राजनीतिक टोन को समझना बहुत कठिन नहीं है।

राजनीतिक और कानूनी गलियारों में इस बात की संभावना पर चर्चा हो रही है कि इस कोलाहल के बीच सरकार यह सफाई मांग सकती है कि जजों की नियुक्ति पर बुरी तरह विभाजित कलीजियम की सिफारिशें अनिवार्य हो सकती हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के मामले में चीफ जस्टिस और 4 अन्य सबसे सीनियर जजों वाली कलीजियम की राय बेहद महत्वपूर्ण होती है। मोदी सरकार के कार्यकाल में संसद से सर्वसम्मति से पारित किए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बिल को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने आयोग के गठन को जजों की नियुक्ति के मामले में अपने एकाधिकार के खिलाफ माना था।

सरकार के सूत्रों का कहना है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ 4 सीनियर जजों के इस तरह के विरोध से कलीजियम की पवित्रता का गंभीर संवैधानिक मुद्दा खड़ा हुआ है। एक सूत्र ने कहा, ‘कलीजियम सिस्टम काम करता नहीं दिख रहा है।’ जजों का यह विद्रोह कलीजियम की मीटिंग के ठीक एक दिन बाद हुआ, जिसमें सीनियर एडवोकेट इंदु मल्होत्रा और उत्तराखंड के चीफ जस्टिस के.एम. जोसेफ को उच्चतम न्यायालय का जज बनाने का फैसला लिया गया।

यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट के लिए इस तरह के रेफरेंस पर विचार करती है तो यह राष्ट्रपति की ओर से मुख्य न्यायाधीश को अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजा जाएगा। यह अनुच्छेद कहता है, ‘यदि किसी कानून या अन्य किसी मसले से जुड़ा सवाल उठता है, जो सार्वजनिक महत्व का हो और उसमें सुप्रीम कोर्ट की राय लेना जरूरी हो तो राष्ट्रपति की ओर से शीर्ष अदालत से राय ली जा सकती है। इस पर सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत अपनी राय सुप्रीम कोर्ट को देगी।’

जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर, जिसे 1993 में एक जजमेंट के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार में ले लिया था, पर पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने 23 जुलाई, 1998 को शीर्ष अदालत को आर्टिकल 143(1) के तहत रेफरेंस भेजा था। इसमें उन्होंने जजों की नियुक्ति को लेकर तय प्रक्रिया पर मतभेदों को लेकर सवाल उठाए थे।

दोस्तों के साथ शेयर करे.....