Home अंतरराष्ट्रीय सिंगापुर में मिले ट्रंप और किम पर असल विजेता बना चीन!

सिंगापुर में मिले ट्रंप और किम पर असल विजेता बना चीन!

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पेइचिंग

सिंगापुर में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन के बीच हुई मुलाकात का असली विजेता चीन रहा, जो उस समिट में मौजूद नहीं था लेकिन एक महत्वपूर्ण भूमिका में जरूर था। हालांकि, चीन अब ट्रंप और किम की दोस्ती से सावधान भी हो गया है।मुलाकात के बाद जब ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास रोकने और धीरे-धीरे दक्षिण कोरिया से अमेरिकी सैनिक हटाने का ऐलान किया तो यह चीन की ही सबसे बड़ी जीत थी। पेइचिंग दक्षिण कोरिया और जापान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी को पसंद नहीं करता है और कई बार वह अमेरिका से मिलिटरी ड्रिल्स को रोकने की मांग कर चुका है, जिन्हें उत्तर कोरिया घुसपैठ का अभ्यास बताता आया है।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने बुधवार को रिपोर्टर्स से कहा, ‘ट्रंप की सैन्यभ्यास को रोकने की घोषणा इस बात का सबूत है कि चीन का प्रस्ताव वैध है और यह दोनों पक्षों की चिंताओं से जुड़ा है।’अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में यूएस नैशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल के लिए चीन की रणनीति बनाने वाले रायन हैस कहते हैं, ‘चीन उत्तरपूर्वी एशिया में विदेशी सेनाबल की तैनाती में कमी चाहता है ताकि वह वॉशिंगटन और उसके सहयोगी देशों के बीच फासला बढ़े। पेइचिंग अब अपने इस लक्ष्य को पाने के रास्ते पर है वह भी बेहद कम कीमत चुकाकर।’

किम पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है चीन
हालांकि, पेइचिंग उत्तर कोरिया पर अपने प्रभाव को बनाए रखने को लेकर भी सोच-विचार में लगा है। समिट के बाद राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगातार किम की तारीफ हो रही है। ट्रंप ने किम को बेहद क्षमतावान व्यक्ति भी बताया और उत्तर कोरिया को परमाणु निरस्त्रीकरण के एवज में सुरक्षा गारंटी का भी वादा किया है। वाइट हाउस नैशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल में पूर्व चाइना डायरेक्टर पॉल हैनले कहते हैं, ‘अमेरिका और उत्तर कोरिया के संबंधों में किसी भी तरह के सुधार को चीन अपना नुकसान मानेगा।’

तनाव के बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अप्रैल से किम के साथ दो बार वार्ता की हैं। इस तरह के प्रयासों से साफ दिख रहा है कि चीन प्योंगयांग और वॉशिंगटन को उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम खत्म करने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है और साथ ही वह प्योंगयांग को ट्रंप के प्रभाव से भी दूर ले जाने की कोशिश में है।

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