Home कॉर्पोरेट ITR फाइलिंग: ई-वर्जन में फिर बदलाव, टैक्सपेयर्स परेशान

ITR फाइलिंग: ई-वर्जन में फिर बदलाव, टैक्सपेयर्स परेशान

मुंबई

हाल ही में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की कोशिश करने वाले सैलरीड टैक्सपेयर्स को इलेक्ट्रॉनिक वर्जन में कुछ और बदलाव देखने को मिले हैं। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की अंतिम तिथि में अब करीब तीन सप्ताह का समय ही बचा है और ऐसे में बार-बार हो रहे बदलावों से दिक्कतें पैदा हो रही हैं। इन बदलावों की वजह से दोबारा डेटा एंटर करना होता है या आखिरी समय में और जानकारियां जुटानी पड़ती हैं। कुछ मामलों में, टैक्सपेयर्स को अपने चार्टेड अकाउंटेंट्स से नया स्पष्टीकरण मांगना पड़ता है।

सैलरीड टैक्सपेर्यस के लिए आईटीआर की आखिरी तारिख 31 जुलाई थी, जिसे 31 अगस्त तक के लिए बढ़ा दिया गया है।सैलरीड क्लास द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म आईटीआर-1 और आईटीआर-2 के इलेक्ट्रॉनिक वर्जन को क्रमश: 1 अगस्त और 9 अगस्त को बदल दिया गया।

ताजा बदलावों में ‘अन्य स्रोतों से आमदनी’ के तहत टैक्सेबल इनकम के संबंध में अतिरिक्त जानकारियां मांगी जा रही हैं। टैक्सपेयर्स को बैंक सेविंग अकाउंट्स से ब्याज, टर्म डिपॉजिट, इनकम टैक्स रिफंड पर ब्याज और दूसरे ब्याज को अलग अलग दिखाने को कहा जा रहा है।कॉर्पोरेट एंटिटीज के इस्तेमाल वाले आईटीआर-7 सहित सभी आईटीआर फॉर्म में कई बदलाव किए जा चुके हैं। 5 अप्रैल को जारी नोटिफिकेशन के बाद कुछ मामलों में 4 बार तक बदलाव हो चुके हैं।

दिल्ली के चार्टर्ड अकाउंटेंट राजीव खंडेलवाल कहते हैं, ‘आई-टी डिपार्टमेंट इसी तरह चुपके से बदलाव कर देता है। नोटिफाइड फॉर्म को नहीं बदला जाता है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वर्जन को बदल दिया जाता है। चूंकि अधिकतर मामलों में ई-फाइलिंग अनिवार्य है, टैक्सपेयर्स और उनके प्रफेशनल्स को आखिरी क्षणों में बदलाव करना पड़ता है।’उन्होंने आगे कहा, ‘यह ठीक नहीं है कि आप ऐसे बदलाव के बाद रिर्टन फाइल करने वालों से आप अतिरिक्त जानकारी मांग रहे हैं, जबकि पहले आईटीआर फाइल करने वालों से आपने यह जानकारियां नहीं मांगी।’

खंडेलाल ने कहा, ‘टैक्सपेयर्स को बैंक खातों से मिले ब्याज की जानकारी आसानी से मिल जाती है, लेकिन बहुत से लोग आईटी रिफंड पर ब्याज की जानकारी नहीं दे रहे थे, आमतौर पर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता था। आईटी रिफंड पर ब्याज टैक्सेबल है, बहुत से टैक्सपेयर्स अब प्रफेशनल्स से स्पष्टीकरण मांग रहे हैं।’

चार्टर्ड अकाउंटेंट हिनेश आर दोशी ने कहा, ‘बहुत से टैक्सपेयर्स थर्ड पार्टी रिटर्न फाइलिंग सॉफ्टवेयर के जरिए रिटर्न जेनरेट करते हैं। इनकम टैक्स डिपार्टमंट की ओर से जारी वर्जन में कोई बदलाव होने पर थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर में भी बदलाव करना पड़ता है, जिसमें कुछ दिन समय लग सकता है।’

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