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200 से ज्‍यादा बैड लोन अकाउंट्स पर RBI की खास नजर

मुंबई

आरबीआई लगभग 200 बैड लोन अकांउट्स की जांच कर रहा है। ये मामले साल 2011 तक के हैं। मामले की जानकारी रखने वाले कई लोगों ने बताया कि आरबीआई बैंकरप्सी कोर्ट में या डेट रेजॉल्यूशन के बाद अचानक किसी गड़बड़ी के सामने आने से बचने के लिए यह काम बैंकों के बही खातों की अपनी सालाना जांच के तहत कर रहा है।

उन्होंने बताया कि इनमें वीडियोकॉन, एस्सार स्टील, एबीजी शिपयार्ड, भूषण स्टील और मॉनेट इस्पात के अकांउट्स शामिल हैं। उन्होंने बताया कि आरबीआई अन्य बातों के अलावा रीपेमेंट हिस्ट्री, क्लासिफिकेशंस, प्रोविजंस और डेट रिस्ट्रक्चरिंग पर गौर कर रहा है ताकि यह देखा जा सके कि सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं।

एक बैंकर ने कहा, ‘आरबीआई ने कुछ बड़े स्ट्रेस्ड अकांउट्स में की गई प्रोविजनिंग के बारे में कुछ बैंकों से डिटेल्स मांगी हैं। उसने यह भी पूछा है कि इन्हीं अकांउट्स के लिए विभिन्न बैंकों ने किस तरह का एसेट क्लासिफिकेशन किया। मेरा मानना है कि रेगुलेटर यह आकलन कर रहा है कि सही प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या नहीं।’ उन्होंने कहा, ‘रेगुलेटर हर साल बैंकों के बही खातों की जांच करता है। इसी काम के साथ आरबीआई इन बैड लोन अकांउट्स की जांच कर रहा है।’ आरबीआई ने इस संबंध में ईटी के सवालों के जवाब नहीं दिए।

इस बात की पुष्टि नहीं की जा सकी कि नियमों के उल्लंघन का पता चलने पर आरबीआई कार्रवाई करेगा या नहीं, लेकिन माना जा रहा है कि यह जांच 27 अगस्त की डेडलाइन से पहले बैंकों के बही खातों की असल पिक्चर चेक करने की कवायद है। 27 अगस्त तक बैंकों को 2000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा के लोन के लिए डेट रिजॉल्यूशन प्लान को अंतिम रूप देना है। अगर वे ऐसा नहीं कर सके तो उन अकांउट्स को बैंकरप्सी रिजॉल्यूशन के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल के पास भेज दिया जाएगा। एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार ने पिछले हफ्ते बैंक के तिमाही नतीजे के ऐलान के बाद कहा था, ‘यह सब एनुअल सुपरविजन का हिस्सा है, जो हर साल होता है। अभी कुछ भी फाइनल नहीं है।’ उन्होंने कहा था, ‘हालांकि इत्मीनान रखें कि ओवरऑल बुक के 2 पर्सेंट की तय लाइन पार नहीं होगी, मामला चाहे स्लिपेज का हो या क्रेडिट कॉस्ट का हो।’

अधिकतर ऐनालिस्ट्स ने आरबीआई के 12 फरवरी के सर्कुलर के कारण स्ट्रेस को अपने आकलन में शामिल कर लिया है। उस सर्कुलर ने बैड लोन रिजॉल्यूशन के लिए फ्रेमवर्क को बदल दिया है। इससे बैंक डिसक्लोजर्स का मामला सख्त हो गया है। केयर रेटिंग्स के अनुसार, जून क्वॉर्टर में सालभर पहले की इसी तिमाही के मुकाबले ग्रॉस नॉन परफॉर्मिंग असेट्स में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सुस्त रफ्तार से हुई। जून के अंत में इसका आंकड़ा 8.71 लाख करोड़ रुपये था, जिसमें से 1.29 लाख करोड़ रुपये प्राइवेट सेक्टर बैंकों के खाते में थे।

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