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कांग्रेस का सहारा, ‘शिवराज’ के लिए सिरदर्द बन सकता है किसान आंदोलन

पिपलियामंडी

आचार संहिता लगते ही चुनावी सरगर्मिया तो तेज हो गई है, लेकिन पूरे देश में बीते साल किसान आंदोलन का प्रमुख रहे मंदसौर के पिपलीमंडी में हुए गोलीकाडं में मारे गए 5 किसानों का मुद्दा फिलहाल सुनाई नहीं दे रहा है, लेकिन गोलीकांड में मरे किसानों के परिजन आज भी उस दिन को नहीं भूल पा रहे हैं. आज भी इन परिवारों में अंदर ही अंदर किसानों में इस गोलीकांड को लेकर काफी आक्रोश है. किसानों की यह टीस भाजपा की शिवराज सरकार के लिए एक बड़ा सरदर्द साबित हो सकती है, वहीं कांग्रेस मुद्दे को पहले ही दिन से भुनाने में लगी है और इसी के भरोसे नैय्या पार लगाने की हर संभव कोशिश करने जुटी है.

पिछले साल 6 जून को पिपलियामंडी में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से 5 किसानों की मौत हो गई थी. इन पांच में से एक पिपलिया के पास के अभिषेक पाटीदार के परिजनों के बीच अपने बेटे के कम उम्र में ही चले जाने का दुख साफतौर पर नजर आता है. अभिषेक की मौत के डेढ़ साल बाद भी अब तक परिवार के सदस्य उसके कसूर के बारे में शासन-प्रशासन से पूछ रहे हैं.

गोलीकांड को भले ही डेढ़ साल बीत चुका है, लेकिन आज भी किसान उसे भूल नहीं पा रहे हैं. गोलीकांड में अपने साथियों के मारे जाने की बात को याद कर आज भी किसान आक्रोशित हो जाते हैं. किसान नेता और कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर गोलीकांड के आरोपियों को बचाने का आरोप लगया है औऱ कहा कि किसानों के दम पर भी भाजपा सत्ता में आई थी और अब यहीं किसान भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकेंग.

6 जून को पिपलियामंडी के लिए आज भी काले दिन के रूप में याद किया जाता है. इस आंदोलन में किसान अभिषेक, चेनराम, पूनमचंद, कन्हैयालाल और सत्यनारायण धनगर मारे गए थे. गोलीकांड के बाद प्रदेश की शिवराज सरकार के साथ ही केंद्र की मोदी सरकार पर विपक्षियों ने जमकर हल्ला बोला और भाजपा की सरकारों को घेरने का काम किया. अब एक बार फिर चुनाव सर पर है तो कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी खेमें इस मुद्दे को भुनाने की कोशिशो में जुट गये हैं.

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