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15 लाख देने की बात कही थी, अब आम आदमी की जेब खाली हो रही है – शिवसेना

  शिवसेना ने गिरते रुपए और शेयर बाजार के मौजूदा हालात पर टिप्पणी की है. पार्टी के मुखपत्र सामना में बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा गया है कि 15 लाख रुपए देने का वादा हुआ था लेकिन अब जनता की जेब खाली हो रही है.सामना में लिखा गया है ‘विदेश का कालाधन वापस लाएंगे. प्रत्येक व्यक्ति के बैक के खाते में 15 लाख रुपए जमा कराने का आश्वासन मौजूदा सत्ताधारियों ने दिया था. ये 15 लाख रुपए आज तक जमा नहीं हुए मगर निवेशकों से लेकर आम आदमी कि जेब और बैंक खाते खाली हो रहे हैं.’ लिखा गया है, ‘शेयर बाजार ने निवेश हो या जेब में बचा खुचा पैसा, महंगाई की बाढ़ में सब बहता जा रहा है. हमारे यहां ऐसा कहा जाता है की तेज से बारिश आई और पैसा उसमें बह गया लेकिन न 15 लाख तेजी से आए और न ही बारिश ही तेजी से आई, उल्टे जेब का पैसा बह गया, देश की आम जनता की ऐसी भयंकर दशा हो गई है.’ सामना ने संपादकीय में लिखा है, ‘इन दिनों देश में शेयर बाजार से लेकर खुदरा बाजार तक गिरावट का दौर जारी है. शेयर बाजार में कुछ दिनो से जारी गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है. गुरुवार को काम काज शुरू होते ही शेयर बाजार का सूचकांक एक हजार अंक नीचे आ गया. निफ्टी में भी कुछ अलग नहीं हुआ. निफ्टी भी 311 अंक से नीचे गिर गया. इस गिरावट के चलते सिर्फ 5 मिनट में निवेशकों के करीब 4 लाख करोड़ रुपए बह गए.’ शेयर बाजार के मौजूदा हालात पर सामना में लिखा गया है, ‘पिछले 15 – 20 दिनों में करोड़ो रूपए शेयर बाजार में आई सुनामी के चलते निवेशकों की डूबने की नौबत आ गई है. साथ ही डॉलर की तुलना में रुपए का गिरना भी लगातार जारी है. गुरुवार को एक डॉलर की तुलना में रुपया 74 रुपए पर आ गया. मतलब विदेशी मुद्रा के बारे में भी गिरावट थमी नहीं है. शेयर बाजार के व्यवहार से गरीब आदमी का क्या सबंध या वहा होनेवाली करोड़ों रुपयों की गिरावट का आम आदमी पर क्या परिणाम होगा, ऐसे सवाल हमेशा उठाया जाते हैं.’ शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा गया है, ‘सरकार न तो ईंधन मूल्य वृद्धि रोक पाई है और न ही बढ़ती महंगाई. ऊपर से इस बार बारिश भी कम हुई है. अक्टूबर हीट की आंच इस बार काफी तेज हैं. इसका असर सब्जी और फलों के उत्पादनों पर हुआ है, जिसके चलते इनके दाम भी बढ़ गए हैं. स्थिति इतनी गंभीर होने के बावजूद सरकार का दावा है कि अगस्त की तुलना में सितंबर माह में महंगाई दर नीचे आई है. सरकार कागज पर सस्ते होने का आंकड़ा दिखा रही है. हालांकि प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी चारों ओर होने वाली मूल्यवृद्धि से हताश है.’ फरार कारोबारी विजय माल्या और नीरव मोदी पर सामना में लिखा गया कि, ‘ माल्या से लेकर नीरव मोदी तक कई कर्जखोरों के चलते देश का करीब एक लाख करोड़ बह गया है. बैंक की तिजोरी का यह पैसा वापस लेने की बात सरकार कर रही है, कर्ज डूबनेवालो की संपति जब्त करने की कार्रवाई शुरू की है मगर यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है. बकाएदार उद्योगपति हों या स्विस बैक के कालेधन की खातेदार हो, सारा पैसा देश की आम जनता का ही है. जनता ने इसे देश की तिजोरी में भरा था. मगर वह सीधे कर्ज डूबाने वाले उद्योगपतियो की जेब और स्विस बैंक के खाते में पहुंच गया.’ संपादकीय में लिखा गया है, ‘शेयर बाजार धराशायी होने से जिन लोगों के 4 लाख करोड़ रुपए डूबे उसमें आम निवेशक भी है. उनकी जेब से यह पैसा भले ही न गया हो लेकिन उनकी जेब मे गिरनेवाला यह पैसा बह गया है. शेयर बाजार से लेकर खुदरा बाजार तक इन दिनों यही चल रहा है. इसलिए देश की जनता में शेयर बाजार में गिरावट, सूखा और महगाई के कारण परेशानी का माहौल है.’ बीते दिनों पेट्रोल और डीजल के दाम में कटौती पर सामना में लिखा है, ‘केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दी गई पेट्रोल- डीजल की मूल्य कटौती की राहत भी अस्थायी साबित हुई है क्योंकि उसके बाद भी ईंधन मूल्यवृद्धि का सिलसिला जारी है. पेट्रोल-डीजल रोज कुछ न कुछ पैसे महंगा हो रहा है. ऐसी उम्मीद थी कि सरकार द्वारा 4 से 5 रुपए की मूल्य कटौती के कारण आम जनता की जेब में रुपया कुछ समय के लिए थमेगा, लेकिन वो निरर्थक साबित हुआ.’

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