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भेल को वसूलना है कस्टमर से 38 हजार करोड़

नहीं की वसूली तो पड़ जायेंगे वेतन के लाले

भोपाल

भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड(भेल) को कस्टमर से करीब 38 हजार करोड़ वसूलने हैं लेकिन लेट लतीफी के चलते यह वसूली नहीं हो पा रही है। वैसे ही कंपनी के पास ऑर्डरों की कमी बनी हुई है साथ ही पिछले तीन वित्तीय वर्ष से टर्न ओवर का आंकड़ा 28 हजार करोड़ के आसपास ही घूम रहा है। वेन्डरों को भुगतान में भी देरी हो रही है। मजबूरन उसे एफडी तुड़वाकर काम चलाना पड़ रहा है कुछ ऑर्डर ऐसे भी है जिनमें भेल का मार्जिन न के बराबर है। ऐसे में कस्टमर से एक भारी भरकम राशि न वसूल पाना मुसीबत का कारण बन सकता है।

सूत्रों की माने तो कस्टमर से पैसा नहीं आयेगा तो कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वेतन के रूप में कंपनी को एक माह में करीब 400 करोड़ अपने 37 हजार कर्मचारियों को बांटने पड़ते हैं। उस पर बायबैक शेयर की घोषणा भी परेशानी का सबब बने हुए है इस पर करीब 1600 करोड़ खर्च आयेगा। जानकारों की माने तो कंपनी के पास 31मार्च 18 तक करीब 1100 करोड़ का बैलेंस था। जो मौजूदा हालात में 5500 करोड़ रह गया है। ऐसे में समय रहते कंपनी अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर नींद से नहीं जागी तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

यहां तक कि सात माह बाद कर्मचारियों को बांटने के लिए वेतन के लाले तक पड़ सकते हैं। फिलहाल कर्मचारियों का वेज रिवीजन और एरियर का भुगतान भी होना है। सवाल यह है कि यह बोझ भी कंपनी को ही उठाना पड़ेगा। पूर्व चेयरमेन ने जहां कंपनी के लिए बिना जरूरत दबाव की राजनीति के चलते महाराष्ट्र, राजस्थान और साउथ में नई यूनिटें लगाने के नाम पर करोड़ों रूपये फूंक दिये तो वर्तमान चेयरमेन नोएडा में 290 करोड़ की लागत से भेल का 19 मंजिला भवन बनवाने में लगे हैं।

वेन्डरों को अगस्त माह से आज तक भुगतान भी नहीं किया जा रहा है। वहीं टूर एडवांस भी करीब 20-25 दिन में दिया जा रहा है। एक बड़े वेन्डर को तो कार्पोरेट स्तर पर करीब 3500 करोड़ देना है। स्थिति पर काबू पाने के बजाय फिजूलखर्ची पर रोक नहीं लगाई जा रही है। अधिकारियों की वेतन बढ़ोतरी इसी समय में किया जाना किसी से गले नहीं उतर रहा है। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि समय रहते उच्च प्रबंधन क्यों नहीं चेत रहा है या सिर्फ सरकार को खुश करने में लगा है।

भोपाल, हरिद्वार, त्रिची, झांसी, बैंगलौर ईडीएन, हैदराबाद जैसी यूनिटों में इस वित्तीय वर्ष में काम तो है लेकिन अगले साल ऑर्डरों की कमी के चलते बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। भोपाल को छोड़ दें तो अन्य यूनिटों का परफार्मेंस पिछले तीन साल से ठीक ठाक दिखाई नहीं दे रहा है। समय रहते कंपनी केेे मुखिया नहीं चेते तो अगले साल का टर्न ओवर सिर्फ दिखावा मात्र रह जायेगा। यहीं नहीं, धीरे-धीरे कहीं ऐसा वक्त न आ जाये कि इस महारत्न कंपनी को निजी हाथों को सौंपना पड़े।

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