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छत्तीसगढ़: राजनांदगांव में अपना गढ़ बचाते दिख रहे हैं सीएम रमन सिंह

राजनांदगांव

छत्तीसगढ़ में पिछले पंद्रह सालों से लगातार राज्य की कमान संभाल रहे मुख्यमंत्री रमन सिंह लगातार तीसरी बार वापसी के लिए अपनी घरेलू सीट राजनांदगांव से चुनावी मैदान में हैं। यहां से कांग्रेस ने कभी बीजेपी में रहीं करुणा शुक्ला को मैदान में उतारा है और राजनांदगांव में सीएम को घेरने के लिए कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। इस बार सीएम के सामने अपने गढ़ को बचाने की चुनौती है।

छत्तीसगढ़ में भले ही परिवर्तन की मांग दिखाई दे रही हो, लेकिन सीएम की घरेलू सीट और उसके आसपास की सात-आठ सीटों पर उनका प्रभाव ठीक-ठाक दिख रहा है। राजनांदगांव में रमन सिंह के चुनाव की पूरी जिम्मेदारी उनके बेटे तथा राजनांदगांव से सांसद अभिषेक सिंह संभाल रहे हैं। अभिषेक के संसदीय इलाके में मोटे तौर पर राजनांदगांव की छह सीटें और घरेलू जिले कवर्धा की दो सीटें आती हैं। सीएम के घरेलू जिले और उनके बेटे की संसदीय सीट होने के कारण राजनांदगांव हाई प्रोफाइल माना जाता है।

पिछली बार राजनांदगांव जिले की छह में से चार सीटें कांग्रेस के पास और दो सीटें बीजेपी के पास थी, लेकिन इस बार जोगी कांग्रेस के आने से यहां का समीकरण उलटता दिख रहा है। मुख्यमंत्री रमन सिंह के अपने गृह जिले में पीछे बड़ी वजह उनके विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ निजी संबंध और अपने लोगों का काम कराने की तत्परता बताई जाती है। जिले के अधिकांश लोग यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री ने यहां काम तो काफी कराया है। यह रमन सिंह के निजी संबंधों का ही असर है कि उनके जिले के विपक्षी विधायक भी उनके खिलाफ के लिए बोलने के लिए तैयार नहीं है। जिले की राजनीति को काफी करीब से देखने वाले सीनियर पत्रकार और विश्लेषक सुनील कोठारी का मानना है कि पिछले पांच सालों में जिले के विधायकों ने भी किसी बड़े मुद्दे को लेकर अगर सीएम या सरकार का विरोध नहीं किया तो उसकी मुख्य वजह रमन सिंह के सभी के साथ निजी संबंध और उनका व्यवहार है।

उल्लेखनीय है कि राजनांदगांव में रमन सिंह के खिलाफ कांग्रेस ने न सिर्फ पूर्व पीएम अटल बिहारी की भतीजी शुक्ला को आगे किया है, बल्कि उसके लिए खासी मशक्कत भी कर रही है। आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद शुक्ला के प्रचार के लिए राजनांदगांव पहुंचे। सीएम को घेरने के लिए उन्होंने उन्हीं के जिले में तीन बड़े कार्यक्रम किए। कांग्रेस वहां शुक्ला के लिए पूरा दम लगा रही है। अभी तक शुक्ला के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य, शक्ति सिंंह गोहिल, राज बब्बर जैसे नेता सभाएं कर चुके हैं।

दरअसलन, सिंह और शुक्ला के समीकरण भी खासे रोचक रहे हैं। कहा जाता है कि शुक्ला के बीजेपी छोड़ने की एक बड़ी वजह सीएम के साथ उनके रिश्ते थे। करुणा शुक्ला को सीएम के विरोधी खेमे का माना जाता रहा और दोनों के बीच में पटरी नही बैठी। आज वही शुक्ला उनके घर में उन्हें चुनौती दे रही हैं। कांग्रेस ने करुणा शुक्ला की पृष्ठभूमि को देखते हुए भले ही उन्हें सीएम के सामने उतार दिया हो, लेकिन आखिरी मौके पर उनका ऐलान होने से शुक्ला के पक्ष में माहौल खड़ा होता नहीं दिख पा रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर करुणा शुक्ला का नाम कम से कम एक महीने पहले सामने आ जाता तो मुकाबला और मजबूत हो सकता था।

उल्लेखनीय है कि राजनांदगांव ब्राह्मण बहुल इलाका माना जाता है, जहां से कई ब्राह्मण कांग्रेसी नेता रहे हैं। कभी यहां कांग्रेस के किशोरी लाल शुक्ला का वर्चस्व हुआ करता था। करुणा शुक्ला भी उसी परिवार से आती है। इसके अलावा, इस इलाके मैं समाजवादी नेताओं का भी खासा दबदबा रहा है। कभी यहां ठाकुर दरबार सिंह, मदन तिवारी, विद्याभूषण ठाकुर और आईपीएल फ्रांसिस जैसे समाजवादी नेताओं का वर्चस्व था। कांग्रेस और समाजवाद के अलावा अब यहां बीजेपी की भी अच्छी खासी जमीन तैयार हो गई है। जिले की कुछ सीटों पर जोगी कांग्रेस भी टक्कर देती दिख रही है।

गौरतलब है कि जिले की खैरागढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के मौजूदा विधायक गिरवर जंघेल मैदान में हैं, जबकि उनके सामने बीजेपी के टिकट पर पूर्व विधायक कोमल जंघेल मैदान में हैं। पिछली बार वह महज 2000 वोटों के अंतर से हारे थे। कांग्रेस व बीजेपी के दोनों ही उम्मीदवार लोधी समुदाय से आते हैं। यहां त्रिकोणीय मुकाबले में पूर्व सांसद व राज परिवार के देवव्रत सिंह जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। राजघराने के साथ-साथ एक सियासी परिवार से आने के कारण देवव्रत सिंह बीजेपी और कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने वाले उम्मीदवार माने जा रहे हैं।

फिलहाल कांग्रेस के पास खैरागढ़ की सीट के अलावा जो अन्य तीन सीटें हैं, उसमें डोंगरगांव, खुज्जी और मौला मानपुर है। डोंगरगांव में कांग्रेस ने अपने मौजूदा विधायक दलेश्वर साहू को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने अपने पूर्व विधायक और राजनांदगांव से मौजूदा मेयर मधुसूदन यादव को टिकट दिया है। यहां मुकाबला मुख्य रूप से इन दोनों के बीच ही माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर खुज्जी में अपने मौजूदा विधायक भोलाराम साहू का टिकट काटकर छन्नी साहू नाम की महिला को टिकट दिया है। छन्नी साहू को टिकट मिलने के पीछे पिछले दिनों राजनांदगांव में किसान संघ द्वारा किए गए आंदोलन का भी हाथ माना जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि छन्नी साहू के पति किसान संघ के उपाध्यक्ष हैं और संघ के प्रभाव के चलते ही छन्नी साहू को टिकट मिलना बताया जा रहा है। यहां से बीजेपी के हीरेंद्र साहू को टिकट दिया गया है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों के उम्मीदवार साहू समुदाय से आने के कारण साहू वोटों का बंटना तय माना जा रहा है, जिसका फायदा जोगी कांग्रेस के उम्मीदवार को जाता दिख रहा है।

जिले की मौला मानपुर सीट से कांग्रेस में इंद्रदेव शाह मंडावी को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने अपने यहां से कंचनमाला भूआर्य को टिकट दिया है। यहां भी कांग्रेस और बीजेपी दोनों के उम्मीदवार एक ही समुदाय हलवा से आते हैं, जबकि जोगी कांग्रेस ने यहां समझदारी दिखाते हुए गोंड समुदाय के संजीव साह को टिकट दिया है। इस असेंबली सीट में गोंड वोटर्स की तादाद लगभग 80 प्रतिशत मानी जाती है। ऐसे में दो हलवाओं की आपसी लड़ाई में जोगी कांग्रेस को फ़ायदा मिल सकता है।

कांग्रेस ने जिले की डोंगरगढ़ सुरक्षित सीट से भुवनेश्वर सिंह बघेल को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी की ओर से यहां मैदान में मौजूदा विधायक सरोजिनी बंजारे हैं। मुक़ाबला इन दोनों के बीच है।

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