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नक्सल-प्रशासन के बीच झूलते आदिवासी बहुल बस्तर में ऐसी है जिंदगी

जगदलपुर

कभी दुनिया का सबसे बड़ा जिला माने जाना वाला बस्तर भले ही प्रशासनिक सुविधाओं के चलते सात जिलों में बदल गया हो, लेकिन आज भी यह पूरा इलाका आदिवासी बहुल उसी संस्कृति से गमकता दिखता है, जिनके लिए बस्तर जाना जाता था। कहने को विकास की कहानी लगातार लिखने की कोशिश हो रही है, लेकिन यहां के लोगों के जीवन में संघर्षों की कोई कमी नहीं है। फिलहाल यहां चुनाव की गहमागहमी दिख रही है विभिन्न सेनाओं की मुस्तैदी में, प्रशासन की चाक चौबंदी में, राजनैतिक दलों के प्रचार में और चुनाव आयोग और नक्सलियों के बीच चल रहे पोस्टर-बैनर वॉर में।

दूसरी ओर यहां के दूरदराज गांवों में बसे आदिवासी बिना मुखर हुए अपने जीवन की आपाधापी में जुटे हैं। इलाके में आए दिन होने वाले नक्सली हमलों से अप्रभावित लोग अपनी समस्याओं और मुद्दों की बात तो करते हैं, लेकिन बिना कोई उम्मीद जताए।

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो यहां सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद की नजर आती है। घने जंगलों और दुर्गम इलाके से भरपूर यह इलाका तीन प्रदेशों की सीमाओं से जुड़ा है, इनमें महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्य आते हैं। इन राज्यों के लगते हुए इलाके भी नक्सल प्रभावित हैं। यहां आदिवासियों की समस्या है कि ये नक्सलियों व प्रशासन दोनों तरफ से पिसते हैं। कांग्रेस की आदिवासी नेता फूलोदेवी नेताम कहती हैं कि यहां की भोलीभाली जनता दोनों तरफ से पिसती है। उसे दोनों ही परेशान करते हैं। उनका कहना था कि यहां पिछले कुछ अर्से में 27,000 आदिवासी महिलाएं गायब हुई हैं। उनका कहीं कोई अता-पता नहीं है। कुछ मानव तस्करी के जरिए तो कुछ रेप कर आगे बेच दी जाती हैं। बाकियों का रेप कर हत्याकर दी जाती है। यह काम नक्सली और फोर्स दोनों ही कर रहे हैं। कहीं कोई सुनवाई नहीं है।

गौरतलब है कि इस इलाके में राज्य के दूसरे इलाकों की तरह तमाम मुद्दे हैं। विकास के मुद्दे के साथ आदिवासियों व किसानों के हक का मुद्दा, किसानों को बोनस, उनकी उचित फसल के दाम, बिजली व पानी की किल्लत, मोबाइल फोन की खराब कनेक्टिविटी, युवाओं को रोजगार, दूर-दराज के गांवों से प्रमुख शहरी इलाकों की कनेक्टिविटी, सेहत से जुड़ी सुविधाओं की कमी जैसी तमाम समस्याएं हैं। रोचक है कि शुक्रवार को कांग्रेस और बीजेपी दोनों की तरफ से इस इलाके में बड़े रैलियों का आयोजन किया गया। बीजेपी की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी व कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने रैली की। जगदलुपर की अपनी रैली पीएम मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगााया कि कांग्रेस शहरी नक्सालियों का समर्थन करती है, नक्सलियों के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं और ये लोग आदिवासियों की जिंदगी तबाह कर रहे हैं।

वहीं कांकेर इलाके में रैली करने वाले राहुल गांधी कि राहुल ने आरोप लगाया कि उद्योगपतियों के साथ मिलकर पीएम मोदी और सीएम रमन सिंह योजनाओं के जरिए जनता को चूना लगा रहे हैं। छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है, लेकिन यहां की जनता को इसका फायदा नहीं मिलता। पीएम और सीएम के 10-15 उद्योगपति मित्र हैं। वे दोनों किसी भी काम को शुरू करने के लिए उन्हीं की सलाह लेते हैं। यह सरकार हर योजना सिर्फ उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए चलाती है।

‘आदिवासियों को सामने रखकर विकास को प्रभावित करते हैं नक्सली’
इस इलाके में तैनात एक पुलिस अधिकारी का कहना था कि नक्सली विकास के कामों में लगातार बाधा पहुंचाते हैं। वे आदिवासियों को सामने रखकर यहां हो रहे विकास कामों में बाधा पहुंचाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर जगदलपुर रेलवे के पास चाय की दुकान चलाने वाले ओबीसी झंझाराम पास के एक गांव नानगुर से आते हैं। घर में खेती होती है, लेकिन बढ़ते परिवार के चलते शहर आना पड़ा। उनका कहना था कि पिछली बार चाउंर वाले बाबा जब सत्ता में आए थे तो बोनस देने की बात कही थी, लेकिन पूरे चार साल बाद बोनस दिया गया। यहां किसानों की एक पीड़ा है कि सरकार छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर इलाके को धान के कटोरे के तौर समृद्धि के तौर पर पेश करती है, लेकिन किसानों के लिए कुछ खास नहीं होता। उल्लेखनीय है कि शनिवार को बीजेपी अपना मेनिफेस्टो ला रही है। बीजेपी के सीनिसर मंत्री के मुताबिक, हमारे मेनिफेस्टो में किसानों और युवाओं के लिए रोजकार को लेकर काफी कार्यक्रम होंगे।

नक्सल-प्रशासन के बीच जारी पोस्टर वॉर
मजे की बात है कि जहां प्रशासन और चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लगा है, वहीं नक्सल चुनावों का विरोध कर रहे हैं। इस सबके चलते दोनों ही तरफ से पोस्टर और बैनर की जंग चल रही है। दोनों ही पक्ष पोस्टरों और पर्चियों से अपना-अपना पक्ष रखने में लगे हैं। राजनैतिक दलों के पोस्टरों के बीच इन पोस्टरों की आपसी जंग ने चुनावी नजारे को काफी रोचक बना दिया है। खासकर दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा में यह नजारा काफी आम हैं। एक तरफ नक्सली बयान जारी कर, पोस्टर निकाल कर चुनाव का विरोध कर रहे हैं

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