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मोदी की मुसीबत ही 2019 में दिला सकती है बढ़त

नई दिल्ली

मोदी सरकार के सामने जो आर्थिक चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं, उनमें कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की कमजोरी, सरकारी बैंकों का फंसा कर्ज, विभिन्न मुद्दों पर रिजर्व बैंक के साथ तकरार, वित्तीय घाटा आदि शामिल हैं। लेकिन, आगामी वर्ष में होने वाले आम चुनाव से पहले ये सारी समस्याएं खत्म हो सकती हैं। वह भी सिर्फ एक कारक की वजह से। वह है- कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट। S

अचानक बदले हालात
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अक्टूबर के मुकाबले 26 प्रतिशत से भी ज्यादा की बड़ी गिरावट आ चुकी है। अक्टूबर महीने में कच्चा तेल 86 डॉलर प्रति बैरल के चार सालों के उच्च स्तर पर था जो अब गिरकर 65 से 67 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। यह नाटकीय घटनाक्रम तब सामने आया है जब एक महीने पहले ही तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही थी। अमेरिका ने ईरान पर पाबंदियां लागू करने के बावजूद आठ देशों को वहां से तेल आयात की छूट दे दी है। साथ ही, अमेरिका और रूस जैसे देशों से तेल उत्पादन में वृद्धि के कारण बाजार में तेल की आपूर्ति घटी नहीं, जिसकी आशंका जताई जा रही थी।

ऊर्जा क्षेत्र पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमत गिरने का सिलसिला जारी रह सकता है। उनका कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक पर उत्पादन बढ़ाने का दबाव, खुद अमेरिका और रूस में तेल उत्पादन में वृद्धि, अगले साल से अमेरिका द्वारा हर रोज 1 करोड़ 20 लाख बैरल तेल उत्पादन की योजना और भारत समेत आठ देशों को ईरान से तेल आयात की छूट जैसे कारणों से तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है।

मोदी सरकार की बल्ले-बल्ले
कच्चे तेल की कीमतें घटने से भारत के इंपोर्ट बिल में जबर्दस्त गिरावट आएगी क्योंकि भारत बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। विभिन्न आर्थिक मसलों पर तनाव में दिख रही मोदी सरकार के लिए इससे अच्छी खबर हो नहीं सकती है। आयात बिल में कटौती से सरकार का चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) यानी आयात और निर्यात मूल्य में अतंर घटेगा। अगर कच्चे तेल की मौजूदा कीमत में आगे वृद्धि नहीं हुई तो इस वित्त वर्ष में अनुमानित तेल आयात बिल में 8.8 लाख करोड़ रुपये की कमी आ जाएगी। यह पेट्रोलियम मंत्रालय के 77.88 डॉलर प्रति बैरल एवं प्रति डॉलर रुपये की कीमत 72.22 के बराबर होने के अनुमान पर आधारित है।

भरेगा सरकार का खजाना
दरअसल, कच्चे तेल सस्ता होने का मतलब है कि रुपये पर भी दबाव घटेगा और यह डॉलर के मुकाबले मजबूत होगा क्योंकि तेल खरीदने के लिए भारत को कम डॉलर की जरूरत होगी। इतना ही नहीं, मोदी सरकार को फ्यूल और एलपीजी की सब्सिडी पर कम खर्च करने होंगे। उधर, तेल कंपनियां भी पेट्रोल-डीजल के दाम में कटौती कर पाएंगी और पिछले कुछ महीनों से लगातार दाम बढ़ने से परेशान आम जनता राहत की सांस ले पाएगी।

आरबीआई के साथ सुलझेगा रिश्ता
इसका एक साइ़ड इफेक्ट यह पड़ सकता है कि सरकार का आरबीआई के साथ जारी विवाद भी नरम पड़ सकता है क्योंकि आयात बिल घटने से सिस्टम में ज्यादा पूंजी यूं ही आ जाएगी। चूंकि तेल सस्ता होने से महंगाई भी घटती है, इसलिए आरबीआई को भी भविष्य में नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की जगह मिल जाएगी।

2019 का रण और मोदी की किस्मत
कच्चे तेल की खरीद पर कम पैसे खर्च करने का मतलब है कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर पाएगी। सरकार ज्यादा राजस्व जुटाने के लिए कच्चा तेल सस्ता होने पर भी पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी नहीं घटाने का फैसला कर सकती है। एक रिपोर्ट के हवाले से कहा जा रहा है कि सरकार अगले साल से खुशखबरियों का ऐलान करने लगेगी। वोटरों का दिल जीतने के लिए सरकार आगामी 1 फरवरी को पेश होने वाले अंतरिम बजट में कई लुभावनी घोषणाओं कर सकती हैं। सस्ता कच्चे तेल के कारण उसे राजस्व की दिक्कत भी नहीं होगी। इसे मोदी की किस्मत कह लें या कुछ और, लेकिन जो कच्चा तेल मोदी सरकार के गले की फांस बनता दिख रहा था, वही चुनावी मौसम में उसका बड़ा हितैषी साबित हो सकता है।

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