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अमेरिका-चीन की फिर करीबी, भारत के लिए है नुकसानदेह?

नई दिल्ली

भारत और चीन भले ही अपने कारोबारी रिश्तों को सुधारने की बात कर रहे हों, लेकिन इसे ऐक्शन में उतारने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। भारत के कई व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की मानें तो यह प्रोग्रेस काफी धीमी है। उनका कहना है कि यह प्रोग्रेस अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर पर लगाम लगाने के लिए पिछले हफ्ते हुई बातचीत के बाद और धीमी हो सकती है।

आपको बता दें कि पिछले साल डोकलाम गतिरोध के बाद भारत और चीन दोनों देशों ने विश्वास बहाली की बात कही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग इस साल कई बार मिल चुके हैं। इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर भी काफी चर्चा हुई। इसमें पिछले हफ्ते हुई बातचीत सबसे ताजा है, जब दोनों नेता जी-20 समिट से इतर अर्जेंटीना में मिले थे।

भारत और चीन के अधिकारियों ने बताया कि मीटिंग में चीन ने भारत से सोयामील, रैपसीडमील, चावल, और चीनी का आयात बढ़ाने की बात कही जबकि उसने अपने डेयरी उत्पादों, सेब और नाशपाती का भारत को निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया। आपको बता दें कि भारत चीन को अपनी दवाइयों के निर्यात को भी बढ़ाने का इच्छुक है। सच्चाई यह है कि इस बातचीत को डील में परिवर्तित करना काफी मेहनती प्रक्रिया है।

नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया, ‘जब हम कहते हैं कि चीनी नए सुझावों और विचारों को स्वीकार करने के इच्छुक होते हैं तो इसका मतलब है कि बातचीत चल रही है, लेकिन यह काफी धीमी चल रही है। इसे प्रोग्रेस इसलिए कहा जाएगा क्योंकि कुछ महीने पहले हम लोग बातचीत भी नहीं कर रहे थे।’ इस बारे में चीन के वाणिज्य मंत्रालय को भेजे गए फैक्स पर कोई जवाब नहीं आया है।

भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय कारोबार मार्च 2018 में खत्म हुए साल में 89.71 अरब डॉलर के आंकड़े को छू गया। इसमें कारोबार घाटा बढ़कर 63.05 अरब डॉलर रहा, जो चीन के पक्ष में है। खास बात यह है कि पिछले दशक की तुलना में यह 9 गुने से भी अधिक है।

भारत सरकार इस अंतर को कम करना चाहती है। कॉमर्स मिनिस्ट्री द्वारा कराए गए एक अध्ययन में कहा गया है, ‘भारत के लिए चीन की तुलना में कोई भी द्विपक्षीय कारोबारी संबंध ज्यादा आर्थिक और राजनीतिक महत्व के नहीं हैं।’ उधर, अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड टेंशंस घट रही है। दोनों देशों के बीच 90 दिनों तक नया टैरिफ्स न लगाने का फैसला किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे में चीनी सरकार को लग सकता है कि उसे नई दिल्ली के साथ चर्चा को तेज करने की जरूरत नहीं है।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि परेशान निर्यातकों की ओर से सरकार को फोन आ रहे हैं और वे पूछ रहे हैं कि क्या चीन और अमेरिका के बीच सुधरते संबंध से भारत की पोजिशन कमजोर हो जाएगी।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस के महानिदेशक अजय सहाय ने भी कहा कि चीन के साथ अमेरिका के बीच सुलह से पेइचिंग के साथ कारोबार सुधारने में रुकावट आ सकती है। सहाय ने कहा, ‘वैसे चीन-अमेरिका के बीच की टैरिफ टेंशन एक अस्थायी मौका था और कंपनियों के लिए यह उचित नहीं होगा कि वे अपने दीर्घकालिक नीतियों को उसके आधार पर तैयार करें।’

कारोबार बढ़ाने में एक दीर्घकालिक बाधा प्रोडक्ट की क्वॉलिटी है। ट्रेड इंडस्ट्री और सरकारी अधिकारियों ने भारत में कहा कि पेइचिंग और नई दिल्ली को अपने मतभेदों को दूर करने में समय लग सकता है। पिछले हफ्ते भारत और चीन ने एक समझौता किया जिसके तहत पेइचिंग भारतीय फिश मील और फिश ऑइल के आयात का निरीक्षण करेगा।

सोयबीन प्रोसेसर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक ने कहा कि 10 दिसंबर को चीन का एक कारोबारी दल भारत आ रहा है, जो सोयामील प्लांट्स की जांच करेगा। दरअसल, भारत चाहता है कि कई साल पहले से दक्षिण एशियाई देश से सोयामील आयात पर जारी बैन को खत्म किया जाए। भारतीय सोयामील का चीन एक बड़ा खरीदार है। 2011 के आखिर में क्वॉलिटी की चिंताओं के कारण चीन ने आयात पर बैन लगा दिया था।

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