Home फीचर 2019 के लिए पेट्रोल पंप से होकर गुजरेगा मोदी का रास्ता?

2019 के लिए पेट्रोल पंप से होकर गुजरेगा मोदी का रास्ता?

0 48 views
Rate this post

नई दिल्ली

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के कारण मोदी सरकार ने तेल की कीमतों को स्थिर रखा, लेकिन चुनाव बाद कीमतें बढ़ने का यह मतलब नहीं है कि नरेंद्र मोदी के भविष्य पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। चुनाव के कारण सरकारी तेल कंपनियों ने 19 दिनों तक तेल की कीमतों को बढ़ने नहीं दिया। हालांकि जैसे ही चुनाव खत्म हुए कीमतें बढ़ने लगी हैं। राष्ट्रीय राजधानी में रविवार को पेट्रोल की कीमतें 76.24 रुपये प्रति लीटर के रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं जबकि डीजल ने उच्चतम स्तर 67.57 रुपये छुआ।

यह सीधे तौर पर सरकारी तेल कंपनियों द्वारा चार हफ्तों के बाद की गई बढ़ोतरी का ही असर है, जो लोगों को प्रभावित कर रहा है। अगर कर्नाटक चुनाव से पहले तेल की स्थिर कीमतों से राज्य में बीजेपी को मदद मिली तो चुनाव बाद कीमतें बढ़ने से निश्चिततौर पर विपक्ष के पास सरकार को घेरने का मौका मिल गया है।

दरअसल, लोक सभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में सरकार को लोगों के बीच अपनी इमेज का भी ध्यान रखना है। अगर तेल की कीमतें ऐसे ही बढ़ती रहीं तो बीजेपी को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

तरक्की पर होगा असर?
सरकार की ओर से कहा गया है कि हाल में वैश्विक दरें बढ़ना चिंता का विषय है। इससे आयात बिल 50 अरब डॉलर बढ़ सकता है और इसका असर करंट अकाउंट डेफिसिट पर भी होगा। हालांकि आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा है कि तेल की कीमतें बढ़ने से आर्थिक तरक्की प्रभावित नहीं होगी।

आपको बता दें कि नवंबर 2014 के बाद तेल की कीमतें सबसे ज्यादा 80 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। गर्ग ने कहा कि कीमतें बढ़ने से तेल आयात बिल 25 अरब डॉलर से 50 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। पिछले साल भारत ने 72 अरब डॉलर तेल आयात पर खर्च किए थे।

क्या कहते हैं पेट्रोलियम मंत्री?
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि OPEC (पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन) देशों में तेल के कम उत्पादन की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड के दाम बढ़ गए हैं। क्रूड प्राइस में हाल की तेजी के पीछे डिमांड में वृद्धि होना, सऊदी अरब की अगुआई में तेल उत्पादक देशों का उत्पादन में कमी करना, वेनेजुएला में उत्पादन में गिरावट और अमेरिका का ईरान पर प्रतिबंध लगाने का फैसला जैसे कारण हैं।

मई 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर क्रूड ऑइल की कीमतें 113 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 50 डॉलर पर आ गई थीं। वित्तीय घाटे और सोशल सेक्टर के खर्चे को मैनेज करने के लिए संघर्ष कर रही सरकार के लिए यह एक गिफ्ट की तरह था।

2019 से पहले सरकार की चिंता
अब लोक सभा चुनाव से एक साल पहले तेल की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे वित्तीय घाटे पर असर होगा। सरकार के लिए चिंता की बात यह है कि उसे ऐसे समय में आर्थिक विकास को पटरी पर रखने के साथ-साथ सामाजिक योजनाओं पर खर्चे को भी बढ़ाना है। एक रिपोर्ट के मुताबिक तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का राजकोषीय संतुलन 0.1% प्रभावित होता है और करंट अकाउंट बैलेंस GDP का 0.4%। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत जैसे तेल आयातक देशों की ग्रोथ कमजोर हो सकती है और इससे महंगाई बढ़ेगी।

मोदी के सामने है नई चुनौती
तेल की कीमतें बढ़ने से मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है और ग्राहकों की मांग घटती है। इसके अलावा कॉर्पोरेट प्रॉफिट मार्जिन्स घटता है और निवेश भी प्रभावित होता है। मौजूदा हालात में मोदी को कर्नाटक के बाद अब पेट्रोल पंपों पर सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना है। अगले साल होनेवाले आम चुनाव के लिए तैयार हो रही सरकार के लिए यह हालात चिंताजनक है कि लोग ईंधन और सामानों के लिए ज्यादा खर्च करने को मजबूर हो रहे हैं।

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संकेत दिए हैं कि तेल की कीमतें बढ़ने के असर को कम करने के लिए सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर सकती है। उन्होंने कहा, ‘पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर केंद्र काफी संवेदनशील है। कई विकल्पों पर बात हो रही है। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही कुछ परिणाम सामने आएंगे।’ आपको बता दें कि 50% से ज्यादा पेट्रोल की रीटेल प्राइस में टैक्स और डीलर का कमिशन शामिल होता है, जबकि डीजल के लिए यह आंकड़ा 40% से ज्यादा है।

दोस्तों के साथ शेयर करे.....