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36 के फेर में भेल का टारगेट

भोपाल

वित्तीय वर्ष 2017-18 में 3600 करोड़ के टारगेट का आंकड़ा पूरा नहीं कर सकी भोपाल यूनिट वित्तीय वर्ष 2018-19 में इस आंकड़े के फेर में उलझ गई। चर्चा है कि कार्पोरेट की मंशा 36 पार की है लेकि न दिन-रात मेहनत करने के बाद भी इस आंकड़े की सफलता पर प्रश्न चिन्ह सा लग गया है। प्रशासनिक स्तर पर कहा जाने लगा है कि इस यूनिट में कस्टमर के कई जॉब एडवांस में बनकर तैयार तो पड़े हैं लेकिन स्थानीय प्रबध्ंान से लेकर कार्पोरेट तक कोई भी अफसर कस्टमर को जॉब उठाने के लिए तैयार करने में सफल नहीं हो पाये। उत्पादन में सिर्फ सात दिन बाकी हैं और कस्टमर अपना सामान उठाने तैयार नहीं है। इसके चलते 36 का आंकड़ा पार करना मुश्किल दिखाई देने लगा है। देखना यह है कि भेल के मुखिया इन सात दिनों में कौन सा गुल खिलाते हैं।

एसोसिएशन अध्यक्ष पद को लेकर बवाल

1 मार्च 2019 को गोविन्दपुरा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन भले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री के न आने के कारण अपना स्वर्ण जयंती साल नहीं मना पाया हो लेकिन अप्रैल माह में एसोसिएशन का कार्यकाल पूरा होने के कारण चुनाव होना लगभग तय हो गया है। मजेदार बात यह है कि एसोसिएशन ने एक नियम भी तय कर लिया था कि हर दो साल मेें होने वाले चुनाव में पुराना अध्यक्ष नये चुनाव में इस पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते हैं लेकिन यह चर्चा उद्योगपतियों मेें जोरों पर है कि इस बार एसोसिएशन की जनरल बॉडी में यह प्रस्ताव पास कर लिया गया है कि दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके अध्यक्ष भी इसी पद के लिए दोबारा चुनाव लड़ सकेंगे, इसको लेकर गोविन्दपुरा इंडस्ट्रीज सेक्टर में बवाल मचा हुआ है। लोग कहने लगे हैं कि कार्यकारिणी ने अपने ही आदेश को बदलकर रख दिया है। अब इस चुनाव में इस गुट को कितना फायदा मिलेगा या नहीं यह तो वक्त ही बतायेगा।

वाह रे भेल सहकारी भंडार के चुनाव

चार साल में बुरी तरह बर्बाद हो चुकी भेल सहकारी उपभोक्ता भंडार के चुनाव निरस्त होने कर्मचारियों में काफी नारजगी देखी जा रही है। चुने हुए जन प्रतिनिधि न होने से संस्था लगातार घाटे में जा रही है यहां तक कि यहां के कर्मचारियों को तीन-तीन माह से वेतन के लाले पड़े हुए हैं ऐसे में चुनाव पर रोक लगा देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। 22 मार्च को मतदान और उसी दिन परिणााम की तिथि होने के महज चार दिन पहले राजनीति के चलते चुनाव रोक देने से प्रचार अभियान शुरू कर चुके जन प्रतिनिधि हेरान परेशान हैं। एक तो पहले से ही संस्था आर्थिक संकट से जूझ रही है उस पर चुनाव का खर्चा भी सहना पड़ेगा। भले ही अब यह चुनाव लोक सभा के चुनाव के बाद ही हों।

 

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