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बिगड़े बोल, जुबान पर बंदिश, लेकिन आसान नहीं रामपुर में आजम खान की जमीन हिलाना

नई दिल्ली,

सपा महासचिव आजम खान ने 15 साल पहले जिसकी रामपुर की सियासत में एंट्री कराई और सांसद बनवाने में अहम भूमिका अदा की, अब वही जयाप्रदा बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर आजम खान के खिलाफ रामपुर सीट से आमने- सामने हैं. आजम खान ने जयाप्रदा को लेकर अपत्तिजनक टिप्पणी की तो चुनाव आयोग ने 72 घंटे तक उनके चुनाव प्रचार पर हर तरह की बंदिशें लगा दी हैं. हालांकि रामपुर के सियासी और जातीय समीकरण ऐसे हैं जिसमें आजम खान को मात देना जयाप्रदा के लिए आसान नहीं बल्कि लोहे के चने चबाने जैसा है.

रामपुर की राजनीति में आजम खान पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे हैं. आजम को टक्कर देने के लिए इस सीट से दो बार सांसद रहीं फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर मैदान में हैं. वहीं, कांग्रेस ने पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व विधायक संजय कपूर को उतारा है. 1967 के बाद रामपुर में पहली बार है जब कांग्रेस ने रामपुर के ‘नवाब परिवार’ से बाहर के किसी शख्स को प्रत्याशी बनाया है.

उत्तर प्रदेश की रामपुर लोकसभा सीट ऐसी है, जहां मुस्लिम मतदाता हिंदुओं से ज्यादा हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक रामपुर में 51 फीसदी मुस्लिम आबादी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नेपाल सिंह जीतने में तब कामयाब रहे थे, जब कांग्रेस ने नवाब काजिम अली खान को, सपा ने नासिर अहमद खान को और बसपा ने अकबर हुसैन को मैदान में उतारा था. तीनों पार्टियों से मुस्लिम उम्मीदवार के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव का फायदा बीजेपी प्रत्याशी को मिला था. इसके बावजूद सपा उम्मीदवार को महज 23 हजार वोटों से हार मिली थी.

रामपुर सीट पर नवाब परिवार का दबदबा सालों से रहा है. कांग्रेस ने अब तक लगभग हर चुनाव में नवाब परिवार के ही किसी सदस्य को टिकट दिया है. यह पहली बार है कि रामपुर के इस रसूखवाले परिवार से किसी को टिकट न देकर कांग्रेस ने संजय कपूर पर दांव खेला है. ऐसे में प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को देखें तो आजम खान एकलौते मुस्लिम उम्मीदवार हैं. ऐसे में आजम खान को बसपा और आरएलडी का समर्थन हासिल है. ऐसे में रामपुर की सियासत में जितना भी ध्रुवीकरण होगा इसका सीधा फायदा आजम खान को मिल सकता है.

हालांकि जयाप्रदा 2009 के लोकसभा चुनाव में आजम खान के विरोध करने के बावजूद जीत दर्ज की थी. इसी तरह से आजम खान ने 10 साल पहले भी जयाप्रदा के लिए गलत बयानबाजी की थी. उस समय जया प्रदा ने आजम खान के बयान को लेकर मंच से रोईं थी. इसका उन्हें सियासी फायदा मिला था. सपा से होने के चलते मुस्लिम मतदाताओं ने आजम खान के मुखालफत के बावजूद वोट दिया था. लेकिन इस बार के सियासी समीकरण काफी बदले हुए हैं. जयाप्रदा सपा के बजाय बीजेपी से उम्मीदवार के तौर पर मैदान में है. इतना ही नहीं रामपुर नवाब खानदान से कोई प्रत्याशी नहीं है. ऐसे में आजम खान के लिए पूरा सियासी मैदान खाली नजर आ रहा है.

सपा के मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले आजम खान रामपुर विधानसभा सीट से 9 बार विधायक रह चुके हैं. इतना ही नहीं रामपुर की पांच विधानसभा सीटों में से तीन पर सपा का कब्जा है. इसके अलावा रामपुर के नवाब खान की सियासत इन दिनों हाशिये पर है. रामपुर के सियासी वारिस नवाब काजिम अली को आजम खान के बेटे रिकॉर्ड मतों से मात देकर विधायक चुने गए हैं. इसके बाद नवाब परिवार के किसी का लोकसभा चुनाव में नहीं उतरने से मुसलमानों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं दिख रहा है. हालांकि नवाब परिवार का कांग्रेस प्रत्याशी संजय कपूर को है, लेकिन मौजूदा हालात में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा तबका गठबंधन के साथ नजर आ रहा है.

रामपुर की सियासत में नवाब का कब्जा
1957 से हुए अबतक हुए कुल 16 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने रामपुर लोकसभा सीट से नवाब खानदान के लोगों को ही मैदान में उतारा. जिसमें इस कुनबे ने 9 बार लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की है. जुलफिकार अली खां उर्फ मिक्की मियां 5 बार सांसद रहे, वहीं उनकी पत्नी नूर बानों भी 1996 और 1999 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल कर लोकसभा पहुंची हैं.

आजम खान ने अपनी सियासी लकीर नवाब परिवार के खिलाफ खड़े होकर खींची है. रामपुर के सियासत से नवाब परिवार को मात देने के लिए 2004 में आजम खान ने जया प्रदा को चुनाव लड़ाकर संसद पहुंचाया था. लेकिन जयाप्रदा ने आजम खान और अमर सिंह के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में अमर सिंह के साथ खड़ी नजर आईं. यहीं से अदावत इतनी बढ़ गई कि वो सड़क तक नजर आई. आजम खान खुले तौर पर जया प्रदा के लिए बयानबाजी करते आ रहे हैं. हालांकि इस बार दोनों का सीधा मुकाबला है.

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