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लोकसभा चुनाव : न टिप्पणी, न फतवा… मुस्लिम लीडर उकसावे पर भी चुप क्यों?

लखनऊ

बीते चुनावों से उलट यूपी में इस बार मुस्लिम नेता किसी भी तरह की बयानबाजी से बचते दिख रहे हैं और अब तक रणनीतिक चुप्पी ही साधी है। मुस्लिम संगठनों के नेता न तो कोई विवादित टिप्पणी ही कर रहे हैं, न कोई प्रदर्शन और न ही फतवे जारी हुए हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और नदवा स्थित मदरसों के प्रमुखों ने कोई टिप्पणी की है।

सूबे में लोकसभा का चुनाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होते हुए रुहेलखंड के मुस्लिम बहुल सीटों तक आ पहुंचा है। इसके बावजूद देवबंद से लेकर लखनऊ तक के मुस्लिम संगठनों के नेता एक तरह से रणनीतिक चुप्पी साधे हुए हैं। यही नहीं चुनावों के दौरान अपनी सक्रियता के लिए चर्चित रहने वाले दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी भी अब तक चुप हैं।

इसके अलावा अकसर विवादित अपीलें करने वाले देवबंद से भी अब तक ऐसा कोई फतवा जारी नहीं किया गया। यही नहीं रामपुर में जया प्रदा और आजम खान के बीच तीखी जुबानी जंग हुई, लेकिन दोनों के बीच की यह खटास सांप्रदायिक टिप्पणियों के स्तर पर नहीं पहुंची। यूपी में मुस्लिमों की संख्या करीब 19 फीसदी है, लेकिन शायद समुदाय के नेताओं ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के डर से चुप्पी साधे रखी है।

2014 के आम चुनाव और फिर यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने निर्णायक जीत हासिल की। यहां तक कि बीते 5 साल से सूबे में मुस्लिम समुदाय का एक भी सांसद नहीं है। पीएम मोदी के करीबी और कई मुस्लिम संगठनों से जुड़े जफर सरेशवाला ने कहा, ‘बीते दो सालों में हमने पूरे भारत में एक अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया है कि वे किसी भी तरह के उकसावे में न आएं।’

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी कहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम नेताओं मैच्योरिटी दिखाई है। यही नहीं बीजेपी की ओर से कई बार उकसाने की कोशिश करन के बाद भी मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने उनकी ही भाषा में जवाब देने से बचने की सफल कोशिश की है।

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