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अंबानी, अडानी के लिए मोदी बेहतर कि मनमोहन

नई दिल्ली

देश के अग्रणी कारोबारी घरानों के लिस्टेड शेयरों ने मोदी शासन के पिछले पांच वर्षों में मनमोहन सिंह के यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के मुकाबले मिश्रित सफलता हासिल की। पांच-पांच वर्ष के मोदी और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों मे बदलावों के आधार पर किया गया। 2009 से 2014 के दौरान दुनियाभर के उभरते बाजारों में इजी मनी का प्रवाह हुआ जबकि 2014 से 2019 के बीच इसके विपरीत रहा।

आंकड़े बताते हैं कि मोदी शासन में मुकेश अंबानी के रिलायंस ग्रुप का बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) 4.84 लाख करोड़ रुपये बढ़ा। यूपीए दो के पांच वर्षों में यह आंकड़ा महज 11,684 करोड़ रुपये था। मोदी शासन में मुकेश अंबानी के रिलायंस ग्रुप के मार्केट कैप में इतनी बड़ी वृद्धि का श्रेय टेलिकम और रिटेल समेत अन्य अलग-अलग कारोबार में मोटी रकम के निवेश और एनर्जी सेगमेंट में कंपनियों की क्षमता बढ़ाने को जाता है। मुकेश के ये निवेश मुनाफा देने लगे हैं। यही वजह है कि मोदी के शासनकाल में उनकी अग्रणी कंपनि रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. (आरआईल) की रेटिंग सुधर गई।

बात उन्हीं के छोटे भाई अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप, अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) की करें तो इस ग्रुप की कंपनियों के शेयर एग्जिट पोल में एनडी की सत्ता में वापसी का अनुमान जताए जाने के बाद भले ही मजबूत हो रहे हों, लेकिन सच तो यह है कि मोदी सरकार में इस ग्रुप का मार्केट कैप 65,130 करोड़ रुपये घट गया। हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि अनिल अंबानी की ग्रुप कंपनियों का मार्केट कैप यूपीए दो में भी 64,873 करोड़ रुपये घटा था। एडीएजी के मार्केट कैप की गणना करने के लिए रिलायंस कैपिटल का बंद हो चुका बिजनस रिलायंस होम फाइनैंस और हाल ही में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी रिलायंस निप्पन लाइफ पर भी विचार किया गया।

पिछले पांच वर्षों में टाटा ग्रुप के मार्केट कैप में 4.22 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई जो यूपीए 2 के दौरान 5.33 लाख करोड़ रुपये था। दोनों आंकडे़ एस इक्विटी के कॉर्पोरेट डेटाबेस से जुटाए गए हैं। टाइटन, टीसीएस और टाटा क्यूनिकेशंस के मार्केट कैप में अच्छी-खासी वृद्धि से टाटा मोटर्स और टाटा पावर के मार्केट कैप में गिरावट की भरपाई हो गई। दरअसल, सुस्त वैश्विक वातावरण से टाटा ग्रुप का कारोबार प्रभावित हुआ। उदाहरण के तौर पर, कैलेंडर इयर 2011 से 2017 के बीच लग्जरी कार की मांग दुनियाभर में 9 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी जिसमें गिरावट आ गई। इससे टाटा मोटर्स की वृद्धि प्रभावित हुई। चीन में मंदी के बीच दुनियाभर में स्टील की मांग घटने और व्यापारिक तनाव के माहौल ने स्टील की कीमतें घटीं जिसका सीधा असर टाटा स्टील पर पड़ा।

आंकड़े बताते हैं कि बजाज ग्रुप के 10 शेयरों में पिछले पांच वर्षों में 3.62 लाख करोड़ रुपये जुड़े जबकि उससे पहले के यूपीए दो के पांच वर्षों में इसने 76,322 करोड़ रुपये जोड़े थे। वहीं, मोदी शासन में आदित्य बिड़ला ग्रुप के शेयरों की कीमत 1.05 लाख करोड़ बढ़ी जबकि यूपीए दो में यह आंकड़ा 1.02 लाख रोड़ रुपये था।

आज अडानी ग्रुप की छह कंपनियों का मार्केट कैप 1.63 लाख करोड़ रुपये है। इनमें अडानी पोर्ट्स, अडानी पावर्स, अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी गैस, अडानी ट्रांसमिशन और अडानी ग्रीन शामिल हैं। मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों में इन छह में से तीन कंपनियों, अडानी ट्रांसमिशन, अडानी गैस और अडानी ग्रीन का साझा बाजार पूंजीकरण 99,898 करोड़ रुपये आंका गया था और बाद में इन्हें अलग-अलग करके शेयर बाजार में लिस्ट करवाया गया। यूपीए दो शासन के आखिर में अडानी ग्रुप का कुल मार्केट कैप 43,651 करोड़ रुपये था।

वहीं, महिंद्रा ग्रुप के छह शेयरों के भाव यूपीए दो में 1.10 लाख करोड़ रुपये बढ़े थे जबकि मोदी शासन में 48 हजार करोड़ रुपये बढ़े। कंसल्टिंग एडिटर स्वामीनाथन अय्यर ने ईटी नाउ से कहा, ‘यूपीए 1 और यूपीए 2 के दौरान वैश्विक स्तर पर आर्थिक तेजी का दौर था। आप उसे इतिहास का सबसे बड़ी तेजी कह सकते हैं। भारत भी इस तेज गति से भागती दुनिया से बहुत अच्छे से कदमताल मिलाया था। इसके कारण भारतीय शेयर बाजार को बड़ी बढ़त हासिल हुई थी।’

आंकड़े बताते हैं कि भारत के इतिहास में तीन वर्ष, 2010, 2012 और 2013 ही है, जब-जब विदेशी निवेश 1 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया। 2014 में लोकसभा का चुनाव था और उस वर्ष देश में 97,069 करोड़ का विदेशी निवेश आया। लेकिन, 2015 से 2019 के बीच चार सालों में कुल विदेशी संस्थागत निवेश महज 1.20 लाख करोड़ रुपये तक सिमट गया। हालांकि, घरेलू निवेश बढ़ने से इसकी भरपाई हो गई।

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