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महंगाई से मंदी तक, अगली सरकार के सामने कई आर्थिक चुनौतियां

वोटिंग खत्म होने के बाद अब सबकी निगाह 23 मई को मतगणना पर है। हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि जनता ने किसे सत्ता सौंपी है। यदि एग्जिट पोल्स की मानें तो नरेंद्र मोदी दोबारा सत्ता संभालने जा रहे हैं। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां भी जीत का दावा कर रही हैं। सत्ता में जो भी आए, महंगाई से मंदी तक कई चुनौतियां का सामना करना होगा।

मोदी सरकार को 2014 से 2019 तक महंगाई के मोर्चे पर दिक्कत नहीं हुई। ईंधन और खाद्य पदार्थों के दाम कम रहे, लेकिन अगली सरकार में ऐसा नहीं होगा क्योंकि इनके दाम बढ़ने लगे हैं। पश्चिमी एशिया के तेजी से बदलते हालातों की वजह से तेल के दामों में आग लग सकती है तो हाल ही में जारी आंकड़े दिखाते हैं कि लंबे समय तक नरमी के बाद खाद्य पदार्थों के होलसेल दाम में वृद्धि हो रही है।

डिमांड में सुस्ती
अगली सरकार के लिए एक और बड़ी चुनौती डिमांड में कमी की वजह से आने वाली आर्थिक सुस्ती होगी। एफएमसीजी से पैसेंजर वीइकल तक कंज्यूमर डिमांड में कमी से इकॉनमी को जोर का झटका लगा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 के आखिरी तीन महीनों में एफएमसीजी सेक्टर की वृद्धि दर 16 फीसदी थी और इस साल के पहले तीन महीनों में गिरकर 13.6 फीसदी रह गई है। ग्रामीण इलाकों में जरूरी वस्तुओं की बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट आई है।

जीडीपी में गिरावट
31 मई को जीडीपी के आधिकारिक आंकड़े जारी होंगे, जिसमें चौथी तिमाही के आंकड़े तीसरी तिमाही में दर्ज 6.6 फीसदी से भी कम रहने का अनुमान है। आर्थिक मंदी को वित्त मंत्रालय की मासिक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है। इसमें कहा गया है, ‘पिछले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ सुस्ती निजी उपभोग में कमी की वजह से है। निवेश और निर्यात में धीमी वृद्धि हुई है।’ उपभोग वृद्धि (भारतीय जीडीपी का करीब 60 फीसदी हिस्सा) में कमजोरी मौजूदा वित्त वर्ष में भी रह सकती है। इसका एक संबंध NBFC और HFC सेक्टर में लिक्विडिटी संकट भी है।

मैन्युफैक्चिरिंग में कमी
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी कमजोरी बनी हुई है। औद्योगिक उत्पादन मार्च में 21 महीने के निचले स्तर (-) 0.1 पर आ गया।

रोजगार का संकट
आर्थिक सुस्ती की वजह से अगली सरकार को रोजगार के मोर्चे पर भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। रोजगार के मुद्दे ने 2014 नरेंद्र मोदी को सत्ता दिलाई, लेकिन रोजगार संकट को लेकर विपक्ष लगातार उनपर हमलावर रहा। आर्थिक मंदी से रोजगार के नए अवसर कम पैदा होंगे।

टैक्सबेस बढ़ाना
अगली सरकार को राजस्व बढ़ाने के लिए काफी जोर लगाना होगा। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने डायरेक्ट इनकम सपॉर्ट का वादा किया है। ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा है और जीएसटी सुधार की प्रक्रिया में है, अगली सरकार को रेवेन्यू कलेक्शन बढ़ाने के लिए संघर्ष करना होगा ताकि नकदी बांटने की स्कीम को चला सके। विनिवेश और नए स्पेक्ट्रम नीलामी से सरकार कुछ रकम जुटा सकती है।

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