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मोदी सुनामी से पाकिस्तानी मीडिया में हलचल, बताया- सांप्रदायिकता की जीत

भारत के लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर पड़ोसी देश पाकिस्तान की मीडिया में सबसे ज्यादा हलचल रही. पाकिस्तान के कई प्रमुख अखबारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत की खबर को ना केवल प्रमुखता से जगह दी बल्कि कई संपादकीय और विश्लेषण भरे लेख भी देखने को मिले.

पाकिस्तान के अखबार ‘द न्यूज’ में भी पीएम मोदी की सत्ता में वापसी पर प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इसमें छपे एक संपादकीय लेख के मुताबिक, 2019 आम चुनाव में मोदी की शानदार जीत भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक नया अध्याय है. संघर्षरत विपक्ष और 20 करोड़ मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए यह जीत 2014 के चुनावों नतीजों से भी ज्यादा असहज करने वाली है.

अखबार लिखता है, जब अयोध्या आंदोलन चरम पर था तब भी बीजेपी इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाई थी. इसमें कोई शक नहीं है कि इस जीत का श्रेय पीएम मोदी और उनके गुजराती सहयोगी अमित शाह को जाता है लेकिन क्या ये ‘सबका साथ, सबका विकास’ सूत्र की सफलता का वाकई प्रतिनिधित्व करती है?

अखबार के मुताबिक, हिंदू समुदाय को एकजुट कर और मुस्लिमों के खिलाफ भावनाएं भड़काने के बाद बीजेपी ने आम चुनाव में ना केवल क्लीन स्वीप किया बल्कि मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व को भी ऐतिहासिक तौर पर नीचे ले आई. इस बहुमत के साथ भगवा पार्टी निश्चित तौर पर भारत के गणतंत्र, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा पूरी तरह से बदलकर रख देगी. चाहे चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका, यूनिवर्सिटीज या प्रशासन, कोई भी संस्था संघ परिवार के प्रभाव से अछूती नहीं है. आने वाले वक्त में इन संस्थाओं पर मोदी सरकार का प्रभाव बढ़ने के साथ मुस्लिम व अन्य अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व घटता जाएगा.

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार ‘डॉन’ में ‘After Modi’s win’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख छपा है. इस संपादकीय में कहा गया है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने संदेश दे दिया है कि भारत में सांप्रदायिक राजनीति की जीत हुई है और भारत के गणतंत्र के भविष्य पर भी इसका असर दिखेगा. आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों की वजह से नरेंद्र मोदी के वोट बैंक में सेंध लगने की भविष्यवाणियां की जा रही थीं जो गलत साबित हुईं. आक्रामक राष्ट्रवाद के दम पर बीजेपी लोकसभा में शानदार जीत हासिल करते हुए पांच साल का दूसरा कार्यकाल शुरू करने जा रही है.

इस संपादकीय लेख में आगे कहा गया है, ये नतीजे दिखाते हैं कि धार्मिक नफरत और बंटवारे की राजनीति से कैसे मतदाताओं को लुभाया जा सकता है. मोदी का पूरा चुनावी कैंपेन ही मुस्लिम और पाकिस्तान विरोधी था. राष्ट्रवादी भावनाओं को उकसाने के लिए भारत ने पाकिस्तान के भीतर एयर स्ट्राइक भी कर दी.

संपादकीय में कहा गया है कि अब जब चुनाव खत्म हो गए हैं तो उम्मीद कर सकते हैं कि मोदी अल्पसंख्यकों को असुरक्षित महसूस कराने वाले उग्र हिंदुत्ववादी संगठनों को प्रोत्साहन देना बंद करेंगे और उपमहाद्वीप में शांति स्थापना की तरफ आगे बढ़ेंगे. ‘द न्यूज’ के एक अन्य संपादकीय में लिखा है कि बड़ी निराशा में यह कहना पड़ रहा है कि मोदी जी वैचारिक तौर पर देश को इसके धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों से दूर ले जाएंगे और उनके नेतृत्व में भारत की नियति हिंदू बहुसंख्यकवाद के अनुरूप ढलना होगी.

पाकिस्तानी अखबारों में मोदी की जीत की ही नहीं बल्कि भोपाल से हिंदुत्व ब्रैंड के तौर पर उतरीं साध्वी प्रज्ञा की जीत की भी चर्चा हो रही है. द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के एक आर्टिकल में लिखा गया है, ”भारत में मुसलमानों पर बम हमले की आरोपी हिन्दू योगी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भी भोपाल से बीजेपी के टिकट पर जीत मिली है. यह पहली बार है कि कोई आतंकी हमलों में शामिल होने का आरोप झेल रहा नेता भारतीय संसद में चुनकर जाएगा.”

अखबार ने लिखा है, बीजेपी से भोपाल सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली साध्वी प्रज्ञा पहली ऐसी नेता हैं जिस पर आतंकी हमलों में शामिल होने का आरोप है. पाकिस्तान के साथ रिश्तों पर अखबारों ने लिखा है कि ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि दक्षिणपंथी सरकार के आने पर शांति वार्ता की बेहतर संभावनाओं के अपने दावे में इमरान खान सही थे या गलत.

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