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अंतरिक्ष रेस: अमेरिका, चीन, भारत, जानें चांद पर क्यों उतरना चाहती है दुनिया

नई दिल्‍ली

अमेरिका, चीन, रूस के बाद भारत ने भी ‘मिशन मून’ की ओर बहुत तेजी से अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अगले महीने की 15 तारीख को अपने महत्वाकांक्षी और बहुप्रतीक्षित स्पेस मिशन चंद्रयान-2 को लॉन्च करेगा। भारत चंद्रमा पर अपना स्‍पेस मिशन ऐसे समय पर भेज रहा है जब कुछ महीने पहले ही चीन ने अपना अंतरिक्ष यान चांग ई 4 चंद्रमा पर उतारा है। अमेरिका की भी वर्ष 2024 तक चंद्रमा पर मानवयुक्‍त मिशन भेजने की योजना है। इस तरह से कोल्‍ड वॉर के बाद दुनिया में एक बार फिर एक नई स्‍पेस रेस शुरू हो गई है।

दुनिया के अंतरिक्ष इतिहास में 3 जनवरी, 2019 का दिन बेहद महत्‍वपूर्ण है। इस दिन चीन ने अपने अंतरिक्ष यान चांग ई 4 को चंद्रमा के उस हिस्‍से पर उतारा था जहां अब तक कोई नहीं पहुंचा था। चंद्रमा के इस ‘डार्क साइड’ वाले हिस्‍से पर भारत सबसे पहले उतरना चाहता था लेकिन बाजी चीन के हाथ लगी। अब भारत भी अपना चंद्रयान-2 15 जुलाई को लॉन्च करने जा रहा है। इसरो चंद्रयान-2 को पहले वर्ष 2017 और फिर वर्ष 2018 में लॉन्‍च करना चाहता था लेकिन उसे टाल दिया गया था। चीन और भारत दोनों ही देश चंद्रमा पर अपना मिशन ऐसे समय पर भेज रहे हैं जब करीब 50 साल पहले 20 जुलाई, 1969 को अमेरिका ने पहली बार चंद्रमा पर इंसान को उतारा था। आइए जानते हैं कि आखिर क्‍यों विश्‍व की महाशक्तियां चांद पर उतरना चाहती हैं…..

बस्तियां बसाकर अंतरिक्ष में उत्‍खनन
विशेषज्ञों के मुताबिक विश्‍वभर की महाशक्तियों की योजना चांद पर बस्तियां बसाने की है। इसी को देखते हुए चीन ने लंबी अवधि की योजना पर काम करते हुए अपना चंद्रमा उत्‍खनन कार्यक्रम शुरू किया है। उसकी कोशिश वर्ष 2036 तक चंद्रमा पर एक स्‍थायी ठिकाना बनाने की है। चीन चंद्रमा के टाइटेनियम, यूरेनियम, लोहे और पानी का इस्‍तेमाल रॉकेट निर्माण के लिए करना चाहता है। अंतरिक्ष में यह रॉकेट निर्माण सुविधा वर्ष 2050 तक अंतरिक्ष में लंबी दूरी तक उत्‍खनन करने की उसकी योजना के लिए बेहद जरूरी है। चीन क्षुद्र ग्रहों का भी उत्‍खनन करना चाहता है। साथ ही उसकी योजना भू समकालिक कक्षा में सोलर पॉवर स्‍टेशन बनाने की है।

इस साल के आखिर तक चीन अपना चांग ई 5 मिशन लॉन्‍च करने जा रहा है। यह अंतरिक्ष यान चंद्रमा के उस हिस्‍से में उतरेगा जो पूरी दुनिया को दिखाई देता है। यहां से वह मिट्टी के नमूने लेकर पृथ्‍वी पर वापस आएगा। चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख झांग केजिन ने घोषणा की है कि चीन अगले 10 साल में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना शोध केंद्र स्‍थापित करेगा। चीन वर्ष 2030 तक अपने दो रोबॉट चंद्रमा पर भेज रहा है जो पानी और अन्‍य संसाधनों की जांच करेंगे।

चंद्रमा पर अड्डा बनाना चाहता है अमेरिका, मंगल पर नजर
चीन की इन पुख्‍ता तैयारियों को देखते हुए ही पिछले दिनों अमेरिकी उपराष्‍ट्रपति ने भी कहा था, ‘हम इन दिनों एक स्‍पेस रेस में जी रहे हैं जैसाकि वर्ष 1960 के दशक में हुआ था और दांव पर उस समय से ज्‍यादा लगा है। चीन ने रणनीतिक रूप से महत्‍वपूर्ण चंद्रमा के सुदूरवर्ती इलाके में अपना अंतरिक्ष यान उतारा है और इस पर कब्‍जा करने की योजना का खुलासा किया है।’ चंद्रमा के खनिजों का तेजी के साथ खनन अमेरिका के लिए भी बेहद महत्‍वपूर्ण हो गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा एक ऐसे रोबॉट पर काम कर रही है जो प्राकृतिक संसाधनों का पता लगाने के लिए चंद्रमा की मिट्टी को निकालकर उसकी जांच कर सकता है। नासा भी वर्ष 2028 तक चंद्रमा पर एक अड्डा बनाना चाहती है। नासा के ऐडमिनिस्‍ट्रेटर जिम ब्राइडेनस्‍टाइन ने पिछले दिनों कहा था कि हम चांद पर इसलिए जाना चाहते हैं क्‍योंकि हम मानव के साथ मंगल ग्रह पर जाना चाहते हैं।

नासा के इस काम में ऐमजॉन कंपनी के मालिक जेफ बेजोस मदद कर रहे हैं। उनकी एक कंपनी ब्‍लू ओरिजिन एक नए रॉकेट पर काम कर रही है। बेजोस की योजना पृथ्‍वी पर स्थित सभी विशालकाय उद्योगों को अंतरिक्ष में ले जाने की है। चीन और बेजोस दोनों की योजना अंतरिक्ष में मानव बस्तियां बसाने और औद्योगीकरण की है। चीन की सोच है कि धरती पर स्थित परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर अगर उसकी अर्थव्‍यवस्‍था निर्भर रहेगी तो यह लंबे समय के लिए ठीक नहीं होगा। इसीलिए वह अंतरिक्ष के संसाधनों के इस्‍तेमाल पर काम कर रहा है। बेजोस भी मानते हैं कि मानव के रहने के लिए पृथ्‍वी के संसाधन सीमित हैं, इसलिए अंतरिक्ष में रहने की संभावना पर काम करना होगा। बेजोस ने अपने एक भाषण में कहा था कि चंद्रमा के पानी का इस्‍तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है।

रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय संघ भी दौड़ में
रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने भी पिछले साल घोषणा की थी कि वर्ष 2040 तक वह चंद्रमा पर एक बस्‍ती बसाएगी। रूसी विज्ञान अकादमी के प्रमुख एजेक्‍जेंडर सेर्गेयेव ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से चंद्रमा बेहद महत्‍वपूर्ण है। जापान और दक्षिण कोरिया ने चंद्रमा के ध्रुवों पर अंतरिक्ष यान भेजने की योजना का ऐलान किया है। इनकी कोशिस चंद्रमा के प्राकृतिक संसाधनों का इस्‍तेमाल करने की है। उधर, यूरोपीय यूनियन चंद्रमा पर एक ‘मून विलेज’ बनाना चाहती है। इन सब देशों में चीन का प्रोग्राम सबसे ज्‍यादा महत्‍वाकांक्षी लग रहा है। चीन एक मात्र ऐसा देश है जो अंतरिक्ष में बस्‍ती बसाने और उसका इस्‍तेमाल अंतरिक्ष उत्‍खनन में करने की हसरत और योजना रखता है। चीन ने इस दिशा में 3 करोड़ डॉलर निवेश किया है। चीन की यह 30 साल की योजना राष्‍ट्रपति शी चिनफिंग की नागरिक-सैन्‍य एकीकरण रणनीति का हिस्‍सा है।

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