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गुरु पूर्णिमा : क्यों किसी व्यक्ति को नहीं, ध्वज को गुरु मानता है RSS?

नई दिल्ली,

16 जुलाई को देशभर में गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाया गया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विशेष उत्सव मानते हुए हर साल इसे अपनी सभी शाखाओं में मनाता है. इसे संघ के छह उत्सवों में सर्वोपरि माना गया है. इस दिन आरएसएस के कार्यकर्ता भगवा ध्वज की पूजा करते हैं और ध्वज के सम्मान में कई चीजें समर्पित करते हैं.

क्यों व्यक्ति की बजाय ध्वज को माना गुरु-
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गुरु के स्थान पर भगवा ध्वज को स्थापित किया हुआ है. आरएसएस भगवा ध्वज को त्याग और समर्पण का प्रतीक मानता है. इसके पीछे की वजह को वह सूर्य से जोड़कर बताते हैं, जो स्वयं जलकर भी पूरी दुनिया को प्रकाश बांटने का काम करता है. इसी वजह से दूसरों के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले साधु, संत भगवा वस्त्र ही पहनते हैं. आरएसएस भगवा या केसरिया को त्याग का प्रतीक मानता है. संघ का यह भी मानना है कि व्यक्ति में कभी भी कोई खराबी या दुर्गुण आ सकते हैं. लेकिन त्याग का प्रतीक भगवा झंडा हमेशा संदेश ही देगा. ऐसे में व्यक्ति की अपेक्षा ध्वज को गुरु मानना बेहतर है.

यूं ही ध्वज को नहीं मानते गुरु
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया था. विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन गुरु के रूप में हर वर्ष गुरु पूर्णिमा पर इस ध्वज को नमन करता है. भगवा ध्वज को गुरु की मान्यता यूं ही नहीं मिली है. यह ध्वज तपोमय व ज्ञाननिष्ठ भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक सशक्त व पुरातन प्रतीक है.

हजारों सालों से चली आ रही परंपरा
आरएसएस के एक कार्यकर्ता ने बताया कि भारत में हजारों सालों से श्रेष्ठ गुरु बनाने की परंपरा चली आ रही है. करोड़ों लोगों ने व्यक्तिगत रीति से अपने गुरुओं को चुना है. इसलिए इस विशेष दिन हम श्रद्धा से गुरु की वंदना करते हैं. अनेक अच्छे संस्कारों को पाते हैं. यही कारण है कि अनेक आक्रमणों के बावजूद एक सफल राष्ट्र के रूप में भारत ने अपना अस्तित्व बचाए रखा है.

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