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और इंजीनियर साहब की पार्टनर शिप

भोपाल

भेल टाउनशिप के एक इंजीनियर की एक ठेकेदार के साथ पार्टनरशिप चर्चाओं में है। अच्छा वेतन मिलने के बाद भी इंजीनियर साहब को कमाने का ऐसा शौक सवार हो गया है कि वह अपने ही विभाग से जुड़े ठेकेदार को भरपूर लाभ पहुंचाने की कोशिश में लग गये हैं यहीं नहीं जब टाउनशिप में निविदा खोली जाती है तब भी यह साहब नियम विरूद्ध यहां बैठे देखे जा सकते हैं। साफ जाहिर है कि वह अपने लाभ-शुभ के लिए कुछ भी करने तैयार हैं। मजेदार बात यह है कि यह सब टाउनशिप के मुखिया से लेकर महाप्रबंधक मानव संसाधन मुखिया तक को मालुम है मजाल है कि इंजीनियर साहब का कोई बाल भी बांका कर सके। चर्चा है कि इन इंजीनियर और ठेकेदार साहब के बिलों की जांच कराई जाये तो फर्जी बिलों का पर्दा फाश भी हो सकता है। इन दोनों के कारनामों की चर्चा यूनियन के नेता भी करते नहीं थकते।

सर नगर निगम के शौचालय में जाना पड़ता है

यह पहला मौका था जब एक नेताजी दिल्ली की जेसीएम की बैठक में छा गये। दरअसल बैठक तो भेल कर्मचारियों को बोनस देने के लिए नियत की गई थी लेकिन नेताजी को भेल भोपाल यूनिट में काम करने वाले कर्मचारियों की सीवेज समस्या को लेकर यहां तक कह डाला कि सर आवासों का सीवेज का चेम्बर सिस्टम इतना खराब है कि कर्मचारियों को नगर निगम के शौचालय में जाना पड़ता है। महारत् न कंपनी की ऐसी दुर्दशा पहले कभी नहीं देखी। नेताजी ने तो यहां तक कह डाला कि साहब म्युजियम लगाने के लिए तो फटाफट बजट पास हो गया लेकिन कर्मचारियों की आवास की छत से पानी टपकता है इसके लिए बजट क्यों नहीं भेजा जाता। नेताजी की इस बात को सुनकर न केवल भेल के चेयरमेन बल्कि डायरेक्टर भी सकते में आ गये। आनन फानन में भेल भोपाल के अफसरों को कार्पोरेट की डांट भी सुननी पड़ी। इसको लेकर जीएम एचआर ने टाउनशिप के अफसरों की क्लास ले डाली।

भेल टाउनशिप पर करोड़ों खर्च

2000 एकड़ से ज्यादा जमीन की रखवाली करने वाले भेल नगर प्रशासन विभाग(टाउनशिप) पर भेल दिल्ली कार्पोरेट अधिकारी- कर्मचारियों की फौज पर करोड़ों खर्च कर रहा है जबकि कर्मचारियों को न के बराबर सुविधा मिल पा रही है। एक जागरूक नागरिक ने तो इसकी शिकायत करने की तैयारी भी शुरू कर दी है। कहा जा रहा है कि पहले पांच सुपरवाइजर और एक नगर प्रशासक टाउनशिप की कमान संभालते थे। सभी सिविल आफिसों का काम भी सुचारू चलता था लेकिन आज तीन अपर महाप्रबंधक, उप महाप्रबंधक, प्रबंधक और इंजीनियर स्तर के अधिकारी काम संभाल रहे हैं उस पर भारी भरकम स्टॉफ की बात करना तो बेमानी है। व्यवस्थाएं सुधर नहीं पा रही हैं, बजट का पता नहीं तो ऐसे में भारी भरकम वेतन पाने वालों को कारखाने में न भेजना किसी के गले नहीं उतर रहा है।

मामला मेडिकल कमेटी का

हाल ही में भेल के कस्तूरबा अस्पताल की मेडिकल कमेटी की बैठक चर्चाओं में रही। दरअसल मरीजों को सुविधा तक नहीं मिल पा रही है लेकिन नेताओं की खूब चलती है। बैठक में एक आला अफसर ने तो यहां तक कह डाला कि मरीजों को बाहरी अस्पताल में एडमिट कराने के लिए नेताओं की जरूरत नहीं है। लोगों ने यहां तक शिकायत कर डाली कि कुछ नेता मरीजों को एडमिट कराने के नाम पर यूनियनों के लिए चन्दा वसूली तक कर डालते है। इसको लेकर अफसरों ने नेताओं पर तंज भी किया और फटकार भी। अब देखना यह है कि इसका असर कितने समय तक दिखाई देता है। वैसे भी मेनेजमेंट ने एक अपर महाप्रबंधक स्तर के अधिकारी को प्रशासनिक पॉवर देकर कस्तूरबा में बैठा दिया।

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