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भोपाल ईडी के लिए जुड़े और भी नाम

भोपाल

भेल भोपाल यूनिट के मुखिया डीके ठाकुर अगले माह 25 अक्टुबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे मे यहां के मुखिया के दावेदारों की सरगर्मियां तेज हो गई है। पहले राजीव सिंह, एके जैन, टीके बागची और एसके गुलाटी के नाम प्रमुखता से लिये जा रहे थे लेकिन जैसे-जैसे समय करीब आता जा रहा है और नाम भी सामने आने लगे है। अटकलें लगाई जा रही है कि त्रिची यूनिट के ईडी आर पदनाभन, हरिद्वार यूनिट के जेपी सिंह, बनारस यूनिट के टीएस मुरली का भी नाम चर्चाओं में हैं। यह तो कहा जाने लगा है कि परफार्मंेस के आधार पर नये ईडी को भेजा जायेगा। यदि सिफारिश चली तो यूनिट को डूबाने वाले को भी भेजा सकता है। यूं तो यहां के प्रशासनिक हल्के की ज्यादा मांग यह है कि प्रोडक् शन के साथ प्रशासनिक पॉवर वाले को ही यहां का मुखिया बनाया जाये। क्योंकि यहां काम नहीं करने वाले नेताओं की दादागिरी ज्यादा है। रिटायर नेताओं का दबदबा कर्मचारी हित कम और अपने हित साधने मे ज्यादा लगा है। यही कारण है कि नये चेयरमेन इस बार भोपाल यूनिट में दमदार ईडी को भेज सकते हैं।

साढ़े तीन माह में तीन जीएम होंगे रिटायर

भेल दिल्ली कार्पोरेट भोपाल में उत्पादन पाने को पूरी उम्मीद लगाये बैठा है। लेकिन 22 महाप्रबंधकों वाली इसी यूनिट में रिटायरमेंट और ट्रांसफर के चलते इनकी संख्या न के बराबर रह गई है। इस पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी जा रही है। अब देखिये साल खत्म होने में साढ़े तीन माह शेष बचे है इसमें ईडी डीके ठाकुर सहित तीन महाप्रबंधक श्रीमती नीलम भोगल, एमएस किनरा और के माथुर भेल से अलविदा होने वाले हैं। इसके पहले महाप्रबंधक आरके आर्या, ओपी सारस्वत, एम हलदर और एचके निगम भेल को अलविदा कह चुके हैं। उस पर हाइड्रो की जान महाप्रबंधक प्रभारी राजीव सिंह को विशाखापट्टनम, ट्रांसफार्मर विभाग के मेहनतकश महाप्रबंधक प्रभारी को टीके बागची दिल्ली और डीडी पाठक को जगदीशपुर भेज दिया । यहां तक कि प्रमुख चिकित्सा अधिकारी महाप्रबध्ंाक सुनिल गुप्ता हरिद्वार चले गये। अब बागडोर महाप्रबंधक पीके मिश्रा, विनय निगम, एके वाष्र्णेय, एमएल तौरानी, एम ईसादोर, विपिन मिनोचा और एमके श्रीवास्तव के ही हाथ में रहेगी। उस पर भी एक महाप्रबंधक तीन और दो-दो ब्लॉकों की कमान सौंप रखी है। यानी प्रोडक् शन मैनेजमेंट सिर्फ तीन महाप्रबंधकों के पास रह जायेगा तो चेयरमेन साहब भोपाल यूनिट इस बार कैसे रहेगी नम्बर वन तो नम्बर वन बनाने वाले ईडी साहब भी 24 अक्टूबर को भेल को अलविदा कहेंगे।

भेल में दशहरा मनाने चंदा उगाही

यह तो सुना था कि सार्वजनिक उत्सव मनाने वाले चंदा उगाही का काम करते हैं लेकिन सरकारी विभाग इस तरह का काम करे तो किसी के गले नहीं उतरता, वह भी बड़े-बड़े कॉन्ट्रेक्टरों से चंदा वसूली। साफ जाहिर है कि ऐसे में वह कितना बेहतर काम करेंगे यह खुद ही समझ में आ जायेगा, लेकिन यह परम्परा भेल के सिविल विभाग में लंबे समय से चल रही है। इस पर नकेल कसने के बजाय खुद वरिष्ठ अधिकारी बैठक आयोजित कर फैसला ले रहे हैं। चर्चा है कि हाल ही में हुई इस बैठक में दशहरा धूमधाम से मनाने ठेकेदारों से चंदा लेने के लिए लगभग सहमति बन गई है। अब जो ठेकेदार मालामाल है या जिनके पास काम है और साहब की मेहरबानी से पैमेन्ट भी हो रहा है वह तो खुले मन से चंदा देने को ्रतैयार है लेकिन जिनके पास यह सब सुविधाएं नहीं वह ठेकेदार सिर पीट रहे हंै लेकिन चंदा तो देना ही पड़ेगा क्योंकि साहब लोगों का फरमान जो जारी है।

अब आईआर पर भी उठनें लगी उंगलियां

मानव संसाधन का आईआर विभाग भी चर्चाओं में आ गया है। वैसे भी कानून से जुड़े भोपाल यूनिट के कई मामले कोर्ट निपटाने के काम की जवाबदारी भी इसी विभाग को सौंपी गई है। यूं तो भेल की जमीन, दुकान और भवनों के बड़े-बड़े मामले जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक सालों से लंबित पड़े हैं लेकिन हाल ही में एक ऐसा मामला भी चर्चाओं में आ गया है। दरअसल भेल के गांधी मार्केट में एक दुकानदार को भेल नगर प्रशासन विभाग ने तीन-तीन दुकानों का आवंटन कर डाला। कानूनी लड़ाई के चलते उसे दो दुकानें खाली करनी पड़ी जिसमें आज एसबीआई के एटीएम खोल दिये गये हैं। एक दुकान ऐसी भी है जिसका मामला वर्ष 2012 से कोर्ट में लंबित है। अब यह दुकान या तो दुकानदार को मिले या फिर भेल प्रशासन को नुकसान तो दोनों को ही उठाना पड़ रहा है। चर्चा है कि इस मामले को विभाग ने दुकानदारों पर मेहरबानी बरसाने जानबूझकर स्टे की आड़ में कोर्ट में लंबित रखा। अब यह तो जांच में पता चल पायेगा कि आखिर माजरा क्या है। यह बात भी चर्चाओं में है कि भेल के व्यापारी नेताओं को भी भेल प्रशासन ने एक नहीं पांच-पांच दुकानें आवंटित की है जिन पर अतिक्रमण भी है। विजय मार्केट में तो यह दुकानें एक करोड़ तक में विक्रय हो रही हैं लेकिन भेल प्रशासन को भनक होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।

न मच्छर मरते हैं न कीड़े

भेल कारखाने और टाउनशिप में मच्छर मारने वाली दवा को लेकर चर्चाएं जारी है। यह दवा फेक्ट्री मेन स्टोर ने खरीदी वह भी लाखों की। इसको लेकर कर्मचारी यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि यह इस दवा से न तो मच्छर मरते हैं और न कीड़े। भले ही यह दवाई ड्रम में बुलाई गई हो लेकिन कारखाना एफसीएक्स में इसे बोतल में भरकर सप्लाई किया जा रहा है जिस पर न तो किसी कंपनी का नाम, एक्सपायरी डेट, मेन्युफेक्चरिंग डेट यहां तक कि बेच नंबर भी नहीं है। यह दवा ईडी सचिवालय के प्रशासनिक भवन तक छिड़काव के लिए भेजी जाती है। ऐसे में कर्मचारी इस दवा को लेकर काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं। वह यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि साहब यह दवा किस कंपनी से आई इसकी जांच तो करा लो।

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