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‘मेक इन इंडिया’ के लिए आयात घटाना जरूरी?

नई दिल्ली

वाणिज्य मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों और विभागों से उन उत्पादों की सूची तैयार करने को कहा है जिनका आयात पूरी तरह या आंशिक तौर पर रोका जा सकता है। इसका मकसद देश का बढ़ता इंपोर्ट बिल है। भारत का आयात खर्च वित्त वर्ष 2017-18 में 456.6 अरब डॉलर के मुकाबले वित्त वर्ष 2018-19 में 9% बढ़कर 507.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। आयात खर्च में वृद्धि से चालू खाता घाटा बढ़ता है जिस कारण देश का विदेशी मुद्रा विनिमय दर (फॉरन करंसी एक्सचेंज रेट) में भी गिरावट आती है।

आयात में अड़ंगा
पिछले वर्ष सितंबर में सरकार ने एसी, घरेलू इस्तेमाल के फ्रिज, वॉशिंग मशीन, हवाई जहाजों के ईंधन समेत 19 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया था ताकि बढ़ते चालू खाता घाटे पर लगाम लगाई जा सके। भारत में आयात होने वाली वस्तुओं की सूची में कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, दालें, ऊर्वरक, मशीनी औजार और दवाइयों से संबंधित उत्पाद शीर्ष पर हैं।

RCEP से बाहर, EU से बातचीत
भारत ने 16 देशों के बीच व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक सहभागिता (आरसीईपी) के समझौते से खुद को अलग कर लिया ताकि चीन के माल की बाढ़ से बचा जा सके। हालांकि, इसने कुछ दिनों बाद ही यूरोपियन यूनियन (ईयू) के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू कर दी।

पुरानी सोच
आयात घटाने या शुल्क बढ़ाकर इसकी राह में रोड़ा अटकाने के पीछे की सोच यह होती है कि इससे घरेलू उत्पादन में वृद्धि होगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। भारत 1980 के दशक तक इसी सोच पर आगे बढ़ता रहा। उम्मीद थी कि जरूरत के सारे उत्पाद देश में ही बनाए जाएंगे। लेकिन, इस सोच को साकार करने वाले उद्योग स्थापित नहीं हो सके और न ही जरूर उद्योगों के लिए निवेश आकर्षित हुए। 1990 के दशक में आर्थिक उदारवाद को अपनाने और 2001 में आयात के लिए लाइसेंस लेने की व्यवस्था खत्म करने के बाद ही भारतीय उद्योगों को फायदा हुआ और निर्यात-आयात बढ़ने लगे।

समस्या क्या है?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार को खपत रोकने के बजाय घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। आयातित वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने से भी भारत ग्लोबल प्रॉडक्शन नेटवर्क से बाहर हो जाता है जिसमें बने रहने के लिए वस्तुओं के निर्बाध आवागमन की दरकार होती है। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कहा, ‘आर्थिक उदारवाद के रास्ते पर चलते हुए हमने उन उत्पादों का निर्यात बढ़ाया जिनकी उत्पादन लागत कम आती थी और उन उत्पादों की आयात बढ़ाई जिनकी उत्पादन लागत ज्यादा होती थी। देश में ऐसी वस्तुएं बनाने में होशियारी नहीं जिन्हें हम कम कीमत पर आयात कर सकते हैं। आयात घटाने के लिए टास्क फोर्स गठित करने की जगह हमारी रणनीति निर्यात का दायरा बढ़ाने की संभावनाएं तलाशने के लिए टास्क फोर्स बनाने और फिर इस दिशा में बेहद तेजी से कदम बढ़ाने की होनी चाहिए।’

फिर एक बार बुरी खबर
बहरहाल, आर्थिक मोर्चे पर सोमवार को एक बार फिर से बुरी खबर आई। इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रॉडक्शन (IIP) के अनुसार, सितंबर में औद्योगिक उत्पादन 4.3% की गिरावट के साथ इस सीरीज (बेस ईयर 2004-05) में करीब आठ वर्षों के निचले स्तर पर चला गया। अक्टूबर 2011 में आईआईपी में 5% कमी आई थी। सितंबर 2018 में औद्योगिक उत्पादन 4.6% बढ़ा था। इसी महीने जारी आंकड़े में कहा गया कि सितंबर महीने में आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों की वृद्धि दर घटकर 5.2% पर रह गई जो 14 वर्ष में सबसे कम है।

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