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क्या संसद के पास हैं नागरिकता में संशोधन के अधिकार? जानें,

नई दिल्ली

क्या संसद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 जैसे बिल पर चर्चा करने और इसे पारित करने में संवैधानिक रूप से सक्षम है? गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में सिटिजनशिप (अमेंडमेंट) बिल पेश करने पर विपक्ष ने दावा किया कि संसद को इस तरह के (धार्मिक आधार पर बंटवारे के प्रावधानों वाले) विधेयक पर चर्चा करने और इसे पारित करने का अधिकार ही नहीं है। विपक्षी लोकसभा सांसदों ने संसदीय कार्यवाही के नियमों के अनुच्छेद 72(1) का हवाला देकर सदन की क्षमता पर सवाल उठाया। इन सांसदों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 11 और अनुच्छे 14 का जिक्र कर यह साबित करने की कोशिश की कि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में गैर-संवैधानिक है और इन दोनों संवैधानिक अनुच्छेदों की अवहेलना करता है। आइए जानते हैं कि लोकसभा में वाद-विवाद के दौरान जिक्र किए गए इन अनुच्छेदों में क्या-क्या कहा गया है…

लोकसभा की कार्यवाही के लिए तय रूलबुक का आर्टिकल 72(1) क्या कहता है?
अगर किसी विधेयक को सदन के पटल पर रखने के प्रस्ताव का विरोध होता है तो स्पीकर (लोकसभा अध्यक्ष), अगर उसे उचित प्रतीत हो तो, प्रस्ताव का विरोध कर रहे सदस्य और प्रस्ताव पेश करने वाले सदस्य को संक्षिप्त बयान की अनुमति देकर, बिना आगे और वाद-विवाद के प्रस्ताव को पटल पर रख सकते हैं। बशर्ते अगर प्रस्ताव का विरोध इस आधार पर किया गया हो कि विधेयक सदन की विधायी क्षमता से परे जाकर कानून बनाए जाने का प्रावधान करता है। तब स्पीकर चर्चा की अनुमति दे सकते हैं। चर्चा पूर्ण होने के बाद स्पीकर को प्रस्ताव को पेश किए जाने के पक्ष और विरोध का फैसला मतदान से करवाना होगा।

विपक्षी सांसदों ने नागरिकता विधेयक का यह कहकर भी विरोध किया कि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने तो संविधान की पूरी प्रस्तावना ही पढ़ दी। संविधान की प्रस्तावना कहती है…

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करानेवाली, बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति माघशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

स्पीकर ने जिन विपक्षी सांसदों को सिटिजनशिप बिल पर बोलने की अनुमति दी थी, उनमें से ज्यादातर ने संविधान के अनुच्छेद 11 का उल्लेख किया। दरअसल, संविधान का भाग दो नागरिकता के विषय को समर्पित है। इस भाग में 5 से 11 अनुच्छेद के तहत नागरिकता के सवालों का समाधान किया गया है।

अनुच्छेद 11 क्या कहता है
संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विधि द्वारा विनियमन किया जाना। इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों की कोई बात नागरिकता के अर्जन और समाप्ति के तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संसद की शक्ति का अल्पीकरण नहीं करेगी। इसी तरह, संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता शीर्षक से समानता के मौलिक अधिकार के उपबंध की व्याख्या करता है। इसमें कहा गया है… राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।

इस अनुच्छेद को स्पष्ट रूप से दो भागों में बांटा है। एक भाग राज्य को किसी भी व्यक्ति को ‘विधि के समक्ष समता’ के अधिकार से वंचित नहीं करने की कड़ी हिदायत देता है तो लगे हाथ दूसरा भाग यह कहता है कि राज्य को स्पष्ट निर्देश देता है कि वह ‘विधियों के समान संरक्षण’ से किसी भी नागरिक को वंचित नहीं करे।

‘विधि के समक्ष समता’ का प्रावधान किसी भी प्रकार के विभेद को प्रतिबंधित करता है। यह एक नकारात्मक अवधारणा है। वहीं, ‘विधियों के समक्ष समान संरक्षण’ का प्रावधान राज्य को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह अपने सभी नागरिकों में समानता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों में निश्चित व्यक्ति, समुदाय अथवा समूह को विशेष सुविधाएं दे। यानी, इसकी अवधारणा सकारात्मक है। इस तरह अनुच्छेद 14 का निहितार्थ यह है राज्य समान क्षमता के नागरिकों के साथ एक जैसा व्यवहार करे जबकि सुविधाहीन वर्ग को विशेष सुविधा प्रदान कर उसे दूसरों के बराबर ला खड़ा करे। गृह मंत्री अमित शाह ने इसी आधार पर विपक्षी सांसदों से पूछा था कि क्या आर्टिकल 14 में मिले समानता का अधिकार के मद्देनजर अल्पसंख्यकों को दिया जा रहा विशेष अधिकार असंवैधानिक है।

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