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BJP के हिंदुत्व कार्ड के लिए कांग्रेस का ये प्लान

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नई दिल्ली

अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के इस सप्ताह के अंत में होने जा रहे महाधिवेशन में पेश होने वाले राजनीतिक प्रस्ताव में पार्टी ‘भारतीय मूल्यों’ पर जोर दे सकती है। पार्टी के एक सूत्र ने बताया कि ‘आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्व की संकीर्ण और लोगों को बांटने वाली विचारधारा’ का जवाब देने के लिए पार्टी ऐसा करेगी। राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे में समान सोच वाले दलों से गठबंधन की इच्छा का संकेत तो होगा, लेकिन ज्यादा जोर पार्टी को हर राज्य में नए सिरे से मजबूत करने पर होगा ताकि यह राष्ट्रीय स्तर पर खुद को बीजेपी के भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश कर सके।

आर्थिक मुद्दों से जुड़े प्रस्ताव के मसौदे में कांग्रेस को ‘गरीब समर्थक दल’ के रूप में पेश किया जाएगा। इसके साथ ही आर्थिक सुधारों के लिए प्रतिबद्धता जताई जाएगी और इन्हें लोगों की भलाई के उपाय के रूप में पेश किया जाएगा। पार्टी इस बात पर जोर देगी कि युवाओें, महिलाओं और मध्य वर्ग के अलावा आर्थिक रूप से वंचित तबकों को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए जरूरी आर्थिक सुधारों पर जोर देगी। कांग्रेस के सूत्र ने बताया कि पार्टी ‘मोदी सरकार जैसे आर्थिक सुधारों पर जोर नहीं देगी, जिनका मकसद कुछ अमीर लोगों के हाथ में संपत्ति केंद्रित करना है और गिरोहबंद पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) को बढ़ावा देना है।’

इन प्रस्तावों के मसौदे कांग्रेस स्टीयिरंग कमिटी के सामने मंजूरी के लिए रखे जाएंगे, जो जरूरत होने पर इनमें बदलाव कर सकती है। उसके बाद इन प्रस्तावों को महाधिवेशन में रखा जाएगा। इन दिनों हर राज्य में ‘किसान राजनीति’ के बढ़ते जोर को देखते हुए कांग्रेस किसानों के मुद्दे पर एक अलग प्रस्ताव पेश करेगी, जिसमें वह उनके कल्याण के उपाय बताएगी।

‘पंथनिरपेक्षता’ की शब्दावली से कुछ हटते हुए ‘भारतीय मूल्यों’ पर कांग्रेस के जोर देने का मतलब यह है कि वह खुद को विविधता भरे देश में सहिष्णु और उदारवादी हिंदू विचारों के पैरोकार के रूप में पेश करना चाहती है। यह पोजिशनिंग इस मायने में अहम है कि बीजेपी खुद को हिंदू समर्थक पार्टी और कांग्रेस को ‘अल्पसंख्यकों की पैरोकार’ के रूप में पेश करने की कोशिश करती रही है। बीजेपी की इस कोशिश के दायरे से खुद को बाहर निकालने की कांग्रेस की फिक्र कुछ दिनों तब साफ रूप से सामने आई थी, जब पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने माना था कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार इसी मकसद से मंदिरों में जा रहे थे।

कांग्रेस मोदी सरकार से दो-दो हाथ करने में गठबंधन की राजनीति की जरूरत मानती तो है, लेकिन संगठन और अपनी चुनावी मशीनरी के सामने उभरी बड़ी चुनौतियों को देखते हुए पार्टी महाधिवेशन में खुद को नए सिरे से मजबूत करने पर ज्यादा जोर देगी क्योंकि उसे अहसास हो गया है कि गठबंधन की मोलतोल वाली राजनीति में खुद को केंद्रीय स्थिति में लाना जरूरी है।

कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने कहा, ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के इस सेशन में इस बात को स्वीकार करना होगा और इस तथ्य को प्रोजेक्ट करना होगा कि कांग्रेस अब एक विपक्षी दल है, एक चैलेंजर है और इसे कभी सत्ता में रहने के हैंगओवर से उबरना होगा। पार्टी को अपनी खोई जमीन पाने के लिए पूरा जोर लगाना होगा।’

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