Home राजनीति केंद्र और राज्यों के चुनाव एकसाथ, एक्सपर्ट्स बोले-काफी मुश्किलें हैं राह में

केंद्र और राज्यों के चुनाव एकसाथ, एक्सपर्ट्स बोले-काफी मुश्किलें हैं राह में

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नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने की दिशा में पहल की है। पीएम मोदी को इस दिशा कई क्षेत्रीय दलों का भी साथ मिला है। मोदी सरकार और बीजेपी का मानना है कि नीतीश कुमार की जेडीयू और एआईडीएमके की ओर से एकसाथ लोकसभा-विधानसभा चुनाव कराने की योजना पर समर्थन मिलने के बाद राजनीतिक सहमति की ओर बात तेजी से बढ़ी है। दोनों दलों ने कहा है कि वे पीएम मोदी की इस पहल के साथ हैं और जरूरत पड़ने पर बिहार और तमिलनाडु में समय पूर्व चुनाव कराने को तैयार हैं।

इसके अलावा ओडिशा की बीजेडी, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र प्रदेश की टीडीपी को इस प्रस्ताव से कोई परेशानी नहीं होगी, क्योंकि दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव पहले ही लोकसभा के साथ होते रहे हैं। इन सहमति के बीच चुनाव आयोग ने यह कहकर और इस बहस को आगे बढ़ा दिया कि वह सितंबर 2018 के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने को तैयार है। लेकिन क्या वाकई देश भी इसके लिए तैयार है? हमने इस मुद्दे पर कई एक्सपर्ट और पूर्व चुनाव आयुक्तों से बात की तो यह बात सामने आई कि एकसाथ चुनाव का विचार तो बेहतर है, लेकिन इसे लागू करना बहुत ही कठिन होगा और यह तत्काल संभव नहीं दिखता है।

1. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी का मानना है कि भले ही चुनाव आयोग ने कह दिया हो कि सितंबर-2018 के बाद वह साथ चुनाव कराने को तैयार है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। क्या चुनाव आयोग के पास इतने पेपर ट्रेल ईवीएम (वीवीपैट) हैं? क्या इतने संसाधन हैं? उन्होंने कहा कि सरकारी मशीनरी भी एक ही होगी और दोनों चुनाव में जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। ऐसे में अतिरिक्त मैनपावर कहां से लाएंगे? यह सोच अच्छी है लेकिन इसे व्यावहारिक धरातल पर उतारने में अभी लंबा वक्त लग सकता है।

2. एकसाथ चुनाव कराने के लिए कई विधानसभाओं का टर्म पहले समाप्त करना होगा। इसके लिए कानून में बदलाव भी करना होगा। संविधान में संशोधन की भी जरूरत हो सकती है। लोकसभा के पूर्व सेक्रटरी जनरल और संविधान के जानकार के अनुसार, सभी राज्य विधानसभाओं से इसे पास कराने की जरूरत हो सकती है। ऐसे में यह प्रक्रिया लंबी और पेचीदा होगी।

3. इसे लागू करने के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति पूरी तरह जरूरी है। भले ही कुछ क्षेत्रीय दल मोदी की इस योजना के साथ दिख रहे हैं लेकिन कांग्रेस, लेफ्ट सहित कई दूसरे दलों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। यह ऐसा प्रस्ताव है जो सभी दलों की सहमति के बिना संभव नहीं है।

4. एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने के बाद भी इसे किस तरह बरकरार रखा जाएगा, इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है। कई बार उपचुनाव होते हैं, कई बार सरकार बदलती है। उस परिस्थिति में क्या होगा, इस बारे में भी आम राय बनाना होगा।

5. 1951-52, 1957, 1962 और 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होते थे। लेकिन 1967 में राजनीतिक उथलपुथल के बाद परिस्थिति बदल गई और फिर चुनाव अलग-अलग होने लगे। तब से लेकर अब तक हर साल कई चुनाव होते हैं और सरकार का तर्क है कि इससे न सिर्फ विकास योजनाओं पर प्रतिकूल खर्च होता है, बल्कि संसाधनों का भी दुरुपयोग होता है।

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