Home राजनीति कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने वाले कभी नहीं बन पाए पीएम!

कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने वाले कभी नहीं बन पाए पीएम!

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कोई राजीव गांधी का करीबी रहा, किसी ने सोनिया को चुनौती दी, फिर भी कोई कांग्रेस उपाध्यक्ष अब तक देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सका है. इसे महज संयोग ही कहा जाए कि कांग्रेस नेताओं का राजनीति करियर उपाध्यक्ष बनने के बाद में परवान नहीं चढ़ पाया है.दरअसल, राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी तय हो गई है. तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक, 19 दिसंबर को राहुल गांधी को देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की कमान सौंप दी जाएगी.कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनाव के लिए 1 दिसंबर को अधिसूचना जारी होगी. इसके लिए 4 दिसंबर को नामांकन होगा और 16 दिसंबर को मतदान होगा. 19 को इसके नतीजे आएंगे.

राहुल गांधी अभी कांग्रेस पार्टी में उपाध्यक्ष पद का ओहदा संभाले हुए है. राहुल गांधी पार्टी में उपाध्यक्ष नियुक्त किए जाने वाली तीसरे शख्स थे. सबसे पहले 1986 में अर्जुन सिंह और 1997 में तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने जितेंद्र प्रसाद को यह जिम्मेदारी सौंपी थी. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उपाध्यक्ष बने दोनों राजनीतिक शख्सियतें बाद में करियर में ऊंचा मुकाम हासिल नहीं कर पाई.

नवंबर 2000 में जितेंद्र प्रसाद सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था. सोनिया गांधी को चुनौती देने के एक साल के भीतर ही जितेंद्र प्रसाद का बीमारी की वजह से निधन हो गया. राजीव गांधी के सबसे करीबी लोगों में शुमार अर्जुन सिंह का भी प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सका. अर्जुन सिंह ताउम्र ही ‘पीएम इन वेटिंग’ रहें.

एक दिन के CM, जो कभी नहीं बन सके PM
भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित और विवादित शख्सियतों में अर्जुन सिंह का नाम भी शुमार हैं. राजनीति के चाणक्य के रुप में पहचाने जाने वाले अर्जुन सिंह का राजनीतिक करियर विवादों से जुड़ा रहा.तमाम राजनीतिक ऊंचाई हासिल करने और बाधाओं को पार पाने के बावजूद अर्जुन सिंह कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सके. चार मार्च 2011 को 81 वर्ष की उम्र में वे इस दुनिया से विदा हो गए थे.

राजीव गांधी के बेहद करीबी
1957 में अर्जुन सिंह पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए. इसके बाद वह कई बार एमपी के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में कई अहम पदों पर रहने के अलावा पंजाब के राज्यपाल भी रहे. मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में उनके पास मानव संसाधन जैसा अहम मंत्रालय था.

1985 में अविभाजित मध्य प्रदेश में हुए चुनाव में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने 251 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसी ऐतिहासिक जीत के बावजूद अर्जुन सिंह केवल एक दिन के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. शपथ लेने के अगले दिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को पंजाब में शांति बहाली के लिए राज्यपाल नियुक्त कर दिया.

पंजाब में राज्यपाल के रुप में सफल पारी खेलने के बाद राजीव गांधी ने नवंबर 1985 में उन्हें अपनी सरकार में वाणिज्य मंत्री बना दिया. राजनीति के इसी दौर में कांग्रेस सांसद ललित माकन की खालिस्तानी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी. उनके निधन से खाली हुई दक्षिण दिल्ली से राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को चुनाव लड़वा दिया. अर्जुन सिंह ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. राजीव गांधी ने एक बड़े सियासी फैसले के तहत 1986 में उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष मनोनीत कर दिया. कांग्रेस के इतिहास में पहली बार किसी को उपाध्यक्ष बनाया गया था.

मंत्री पद से इस्तीफा, नयी पार्टी का गठन
राजीव गांधी की हत्या के बाद पी.वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने और उनसे अर्जुन सिंह की कभी नहीं बनी. बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री के खिलाफ मुखर रुप अख्तियार कर लिया था. उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को लेकर कई सवाल भी उठाए और सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी भी लिखी थी. 1994 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया तो कुछ ही समय के भीतर उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया.

नरसिंहराव से चली राजनीति खींचतान की वजह से आखिरकार उन्हें कांग्रेस से बाहर होना पड़ा. उन्होंने एन.डी. तिवारी की अध्यक्षता में तिवारी कांग्रेस का गठन किया. ये कांग्रेस ज्यादा सफल नहीं हो सकी और उसके टिकट पर अर्जुन सिंह खुद 1996 में लोकसभा का चुनाव मध्यप्रदेश में सतना से हार गए. इसके बाद अर्जुन सिंह कांग्रेस में वापस लौट आए और 1998 का लोकसभा चुनाव उन्होंने होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से लड़ा. लेकिन इस बार भी वह हार गए. 2000 में अर्जुन सिंह राज्यसभा के लिए मध्य प्रदेश से चुने गए.

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