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राहुल को मां सोनिया से सीखनी होगी चुनौतियों से निपटने की कला

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नई दिल्ली

कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का नाम तय माना जा रहा है। इसके साथ ही सोनिया गांधी के पार्टी की कमान संभालने का दौर समाप्त हो जाएगा। 71 वर्षीय सोनिया ने लगातार 19 वर्ष तक 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस की अगुवाई की है। सोनिया को कांग्रेस को 2004 में वापस सत्ता में लाने से पहले कई वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था। हालांकि, यह भी हकीकत है कि 1999 के लोकसभा चुनाव में 114 सीटों और 2014 में 44 सीटों के साथ कांग्रेस की दो सबसे बुरी हार के समय भी सोनिया ही पार्टी की अध्यक्ष थीं।

उनके पार्टी के सर्वोच्च पद के कार्यकाल के कई पहलू हैं। इसी वजह से शायद कांग्रेस के दिग्गज नेता 2019 के लोकसभा चुनाव तक एक संरक्षक के तौर पर उनकी लगातार मौजूदगी चाहते हैं। इससे कांग्रेस और उसके गठबंधन के सहयोगी दलों को राहुल गांधी के प्रस्तावित नेतृत्व में खुद को ढालने में मदद मिलेगी। कांग्रेस से ज्यादा राहुल को सोनिया की कार्यशैली से सीखने की जरूरत है। सोनिया ने कांग्रेस के अंदर कई खेमे होने के बावजूद पार्टी को एकजुट रखने में अच्छी सफलता पाई है। उन्होंने कई बार राजनीतिक चुनौतियों का सामना बहुत समझदारी से किया और पार्टी पर आने वाले खतरों को टाल दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी को हराने के लिए उन्होंने अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को एक साथ लाकर एक मजबूत गठबंधन बनाया था।

सोनिया इस लिहाज से खुशकिस्मत रहीं कि उनके पार्टी का अध्यक्ष बनने के साथ पहले से ही नेताओं की एक मजबूत टीम उनके साथ ही। इस टीम में इंदिरा-संजय के दौर में राजनीति सीखने वाले वरिष्ठ नेताओं से लेकर सोनिया के हमउम्र नेताओं की बड़ी संख्या थी। जब उनके बेटे कमान संभालेंगे तो इनमें से बहुत से वरिष्ठ नेताओं का साथ उनके पास नहीं होगा। इसके साथ सोनिया की मौजूदा टीम भी अब ‘बूढ़ी’ हो रही है और ऐसे में उत्साही लेकिन कम अनुभव रखने वाली टीम राहुल को अपने वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक काबिलियत तक पहुंचने का बड़ा काम करना होगा।

मार्च 1998 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया को कई वर्षों तक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। आरएसएस-बीजेपी ने विदेशी मूल को लेकर सोनिया को निशाना बनाया था और बोफोर्स का मुद्दा दोबारा उछालकर उन्हें घेरने की कोशिश की थी। इसके अलावा 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार से भी उन्हें झटका लगा था। इन सब चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कांग्रेस को मजबूत करने में जुटी रहीं। सोनिया को बड़ी मुश्किलों के समय कांग्रेस को एकजुट रखने में अपनी भूमिका के लिए याद रखा जाएगा। कांग्रेस के नए अध्यक्ष को भी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में उनकी महारत को हासिल करना होगा क्योंकि पार्टी को अब अपनी खोई जमीन दोबारा हासिल करने की तैयारी करनी है और उसका मुकाबला एक बेहद ताकतवर प्रतिद्वंद्वी से है।

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