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RSS पर पूरी तरह बैन चाहते थे नेहरू, पटेल ने दिया था सबूत न होने का हवाला

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कांग्रेस आजादी के बाद से जिस संगठन आरएसएस का सबसे ज्यादा विरोध करती रही है, उसी कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रणब मुखर्जी आज संघ के कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे हैं. इसपर सियासत काफी गर्म है. जानिए क्‍यों भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ पर प्रतिबंध लगाना चाहते थे और किस वजह से सरदार पटेल ने उन्‍हें ऐसा करने से रोका था?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 2025 में उम्र 100 बरस हो जाएगी, लेकिन ये एक ऐसा नाम है जिसका जिक्र होते ही राजनीतिक गलियारों में गर्मी बढ़ जाती है. कांग्रेस के सेक्‍युलर चेहरे को हमेशा से आरएसएस के हार्ड हिंदुत्‍ववादी नीतियों से चुनौती मिलती रही है.

ये बात आजादी के तुरंत बाद की है 1948-49, हिंदू राष्ट्रवाद का नारा लगाती आरएसएस का अस्तित्व उस दौर में ही सवालों के घेरे में आ गया था. महात्‍मा गांधी की हत्‍या के पहले से ही जवाहरलाल नेहरू आरएसएस की गतिविध‍ियों से खुश नहीं थे. उनका मानना था कि आरएसएस एक फासीवादी संगठन है और नेहरू चाहते थे कि आरएसएस पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया जाए. सवाल ये भी उठा था कि क्या आरएसएस सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन होने का ढोंग कर रहा हैं और राजनीतिक तौर पर इस देश के भीतर एक नई चुनौती बन रहा है.

माना जाता है कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभ भाई पटेल ने जवाहरलाल नेहरू को ऐसा करने से रोका था. वल्‍लभ भाई पटेल का मानना था कि बिना सबूत यह कदम नहीं उठाना चाहिए. महात्‍मा गांधी की हत्या के महीने भर बाद सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को 27 फरवरी 1948 को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें कहा गया था ‘आरएसएस का इसमें सीधा हाथ नहीं था, इस हत्या में हिंदू महासभा के उग्रपंथी गुट का हाथ था जिसने सावरकर की अगुआई में यह षडयंत्र रचा था. हमारे पास जो सबूत हैं, उनके आधार पर, संघ को इससे जोड़ना सही नहीं है. आरएसएस कई दूसरे पापों और गुनाहों के लिए जवाबदेह है, मगर इस पाप के लिए नहीं’. हालांकि बाद में सावरकर पर भी आरोप साबित नहीं हो सके.

वहीं वह वल्‍लभ भाई पटेल ही थे, जिन्‍होंने संघ पर प्रतिबंध लगाया. फरवरी 1948 में संघ पर पहली बार तब प्रतिबंध लगा, जब हिंदू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी. संघ पर वो पाबंदी जुलाई 1949 तक रही. गांधी की हत्या के बाद गृह मंत्री सरदार पटेल को सूचना मिली कि इस समाचार के आने के बाद कई जगहों पर आरएसएस से जुड़े हलकों में मिठाइयां बांटी गई थीं. (

इस बात को पटेल ने एक पत्र में भी साझा किया था. पत्र में पटेल ने प्रतिबंध लगाने की वजह बताते हुए कहा था कि देश में सक्रिय नफ़रत और हिंसा की शक्तियों को, जो देश की आज़ादी को ख़तरे में डालने का काम कर रही हैं, जड़ से उखाड़ने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ग़ैरक़ानूनी घोषित करने का फ़ैसला किया है. देश के कई हिस्सों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई व्यक्ति हिंसा, आगजनी, लूटपाट, डकैती, हत्या आदि की घटनाओं में शामिल रहे हैं और उन्होंने अवैध हथियार तथा गोला-बारूद जमा कर रखा है.

सितंबर 1948 में आरएसएस के प्रमुख एमएस गोलवलकर ने सरदार को चिट्ठी लिखकर आरएसएस से प्रतिबंध हटाने की मांग की थी. इस पर सरदार ने 11 सितंबर 1948 को जवाब में कहा था ‘आरएसएस ने हिंदू समाज के लिए काम किया है, लेकिन आरएसएस बदले की आग से खेल रही है और मुसलमानों पर हमले कर रही है. उनके सारे भाषण सांप्रदायिकता के जहर से भरे होते हैं. इस जहर का नतीजा देश को गांधी जी के बलिदान के रूप में चुकाना पड़ा’.

साथ ही सरदार पटेल ने लिखा था कि इस बात में कोई शक नहीं है कि संघ ने हिंदू समाज की बहुत सेवा की है.लेकिन सारी समस्या तब शुरू होती है जब ये ही लोग मुसलमानों से प्रतिशोध लेने के लिए कदम उठाते हैं. उन पर हमले करते हैं. हिंदुओं की मदद करना एक बात है लेकिन गरीब, असहाय लोगों, महिलाओं और बच्चों पर हमले करना बिल्कुल असहनीय है. देश में एक अस्थिरता का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है. संघ के लोगों के भाषण में सांप्रदायिकता का जहर भरा होता है. हिंदुओं की रक्षा करने के लिए नफरत फैलाने की भला क्या आवश्यक्ता है? इसी नफरत की लहर के कारण देश ने अपना पिता खो दिया. महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. सरकार या देश की जनता में संघ के लिए सहानुभूति तक नहीं बची है. इन परिस्थितियों में सरकार के लिए संघ के खिलाफ निर्णय लेना अपरिहार्य हो गया था.

हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्‍होंने बाद में जनसंघ की स्‍थापना की ने भी आरएसएस से बैन हटाने के लिए पटेल को पत्र लिखा था. इस पर पटेल ने 18 जुलाई, 1948 को जवाब दिया था कि जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका. मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का एक अतिवादी भाग षडयंत्र में शामिल था. आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य व्यवस्था के अस्तित्व के लिए खतरा थीं. हमें मिली रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबंध के बावजूद गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं.

हालांकि बाद के दिनों में संघ के सकारात्‍मक कार्यों से खुद जवाहरलाल नेहरू भी प्रभावित दिखें. RSS ने धीरे-धीरे अपनी पहचान एक अनुशासित और राष्ट्रवादी संगठन की बनाई. 1962 में चीन के धोखे से किए हमले से देश सन्न रह गया था. उस वक्त आरएसएस ने सरहदी इलाकों में रसद पहुंचाने में मदद की थी. इससे प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस के परेड में संघ को बुलाया था. 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान दिल्ली में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में संघ ने मदद की थी. 1977 में आरएसएस ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को विवेकानंद रॉक मेमोरियल का उद्घाटन करने के लिए बुलाया था. जब जनता पार्टी बनाते हुए जयप्रकाश नारायण ने आरएसएस की मदद ली थी, तब उन्होंने कहा था कि अगर जनसंघ फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूं. (प्रतीकात्‍मक फोटो: getty)

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