Home राष्ट्रीय SC: जस्टिस लोया की मौत पर PIL से दबा ट्रिगर

SC: जस्टिस लोया की मौत पर PIL से दबा ट्रिगर

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नई दिल्ली

भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए तो बवाल मच गया। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही शुरू होने के महज 15 मिनट पहले यानी सुबह 10:15 बजे इस विवाद की शुरुआत हुई। विवाद का फाइनल ट्रिगर तब दबा जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील एक केस को खास बेंच को ट्रांसफर करने की 4 वरिष्ठ जजों की मांग को खारिज कर दिया।

चीफ जस्टिस ने साफ कर दिया कि वह उस परंपरा को नहीं तोड़ेंगे जिसके तहत उन्हें अपनी पसंद की बेंचों को मामले सौंपने का विवेकाधिकार दिया गया था। दरअसल गुरुवार को चीफ जस्टिस के नेतृत्व वाली बेंच ने स्पेशल सीबीआई जज बीएच लोया की मौत से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई को अपनी मंजूरी दी। जस्टिस लोया सोहराबुद्दीन शेख फेक एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे।

1 दिसंबर 2014 को नागपुर में जस्टिस लोया का निधन हो गया था। बाद में इस मामले में अन्य लोगों के साथ आरोपियों में शामिल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को सीबीआई अदालत ने बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता के आधार पर 2 नबंर से 5वें नबंर तक के चार जजों ने इसे न्यायपालिका और राष्ट्र की अखंडता के महत्व का मामला बताया। साथ ही इसे वरिष्ठ जजों के नेतृत्व वाली बेंचों को सौंपने की मांग की। मांग यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के 25 जजों में वरिष्ठता के क्रम में 10वें स्थान पर आने वाले जस्टिस अरुण मिश्रा से ज्यादा वरिष्ठ जजों की बेंच को मामला सौंपा जाए।

जब चीफ जस्टिस ने इस मांग पर ध्यान देने से इनकार कर दिया तो चारों जजों ने अपना काम खत्म कर मीडिया को बुला लिया। सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों का कहना है कि इस मामले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का फैसला नवंबर 2017 के उस फैसले पर आधारित था जिसमें सीजेआई को ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ बताया गया था। इसके मुताबिक चीफ जस्टिस को अपनी पसंद की बेंचों को मामले सौंपने, बेंच गठित करने और बेंचों में जजों की संख्या तय करने का विवेकाधिकार है।

मांग स्वीकार नहीं किए जाने से निराश चारों जजों ने चीफ जस्टिस को कहा कि अब वे वही करेंगे जो उन्हें उचित लग रहा है। कोर्ट नंबर 2 से 5 तक की अलग-अलग बेंच को हेड कर रहे इन जजों ने अपना काम डेढ़ घंटे में खत्म किया और फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए जस्टिस चेलमेश्वर के आवास पर पहुंच गए। सीजेआई ऑफिस ने कहा कि चीफ जस्टिस ने साफ कर दिया है कि वह परंपरा को नहीं तोड़ेंगे।

सीजेआई ऑफिस के मुताबिक पूर्व चीफ जस्टिस जैसे जस्टिस एचएल दत्तू, जस्टिस टीएस ठाकुर, जस्टिस जेएस खेहर भी अपने विवेकानुसान बेंचों को केस सौंपते आए हैं। ऐसे में वर्तमान सीजेआई ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं जो संवैधानिक बेंच के फैसले पर आधारित परंपरा के खिलाफ हो। चीफ जस्टिस ऑफिस के इस बयान का संदर्भ 4 वरिष्ठ जजों द्वारा सीजेआई को दो महीने पहले लिए गए खत में भी दिखता है। जजों ने इस खत में लिखा कि ऐसे उदाहण हैं जिनमें देश के लिए दूरगामी परिणाम वाले मामलों को चीफ जस्टिस द्वारा चुनिंदा रूप से उनके वरीयता के बेंच को बिना किसी तार्किक आधार के सौंपा गया।

इस खत में यह भी तर्क दिया गया था कि रोस्टर बनाने और केसों को किसी भी जज या बेंच को सौंपने का चीफ जस्टिस का विशेषाधिकार दरअसल अदालत को अनुशासित और कुशल रूप से चलाने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था किसी भी तरह सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जजों पर चीफ जस्टिस को सुपीरियर अथॉरिटी नहीं देती। ऐसा इसलिए क्योंकि इस देश के न्यायशास्त्र में यह बहुत अच्छी तरह से स्थापित है कि चीफ जस्टिस अपनी बराबरी वालों में पहले हैं, वह उनसे न कम हैं न ज्यादा।

चीफ जस्टिस ऑफिस ने चार जजों की चिट्ठी में से जजों की बराबरी वाले कोट का ही इस्तेमाल करते हुए जवाब भी दिया है। चीफ जस्टिस ऑफिस ने कहा कि अगर ये सबसे वरिष्ठ जज कोर्ट में तथाकथित कनिष्ठ जजों के बराबर हैं तो किसी मामले के X जज या Y जज के सामने सूचिबद्ध होने में शिकायत क्या है?

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