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US की ताकत को चुनौती दे रहीं चीनी मिसाइलें, भारत को टेंशन

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नई दिल्ली

करीब 3 दशकों तक अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने आसमान पर राज किया है। हवा में उनके युद्ध कौशल के सामने कोई टिक नहीं सकता था। रूस और चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच अब हालात बदल चुके हैं। चीन की ऐरोस्पेस इंडस्ट्री ने तकनीक के लिहाज से तेजी से प्रगति की है। खासतौर से एयरक्राफ्ट से दागे जानेवाले एयर-टु-एयर मिसाइल सिस्टम्स के क्षेत्र में चीन ने अपना सिक्का जमा लिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इससे पश्चिमी देशों की वायु सेनाओं और वैश्विक आर्म्स ट्रेड के लिए परिस्थितियां बदल रही हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इससे चीन के पड़ोसी भारत के लिए भी तस्वीर थोड़ी बदली है

अपनी एयर फोर्स को आधुनिक बनाने में रूस सबसे आगे रहा और वह लगातार इस दिशा में काम कर रहा है। चीन वैसे तो करीब 13 ट्रिलियन डॉलर (13 लाख करोड़ डॉलर) की अर्थव्यवस्था है और अब वह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी सामरिक चुनौती पेश कर सकता है। स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) के मुताबिक 2017 में चीन का रक्षा खर्च अमेरिकी डॉलर में 5.6 फीसदी बढ़ गया, जबकि रूस का 20 फीसदी घट गया। SIPRI ने बताया कि चीन ने पिछले साल 228 अरब डॉलर और रूस ने 66.3 अरब डॉलर खर्च किया था।

इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रैटिजिक स्टडीज में मिलिटरी ऐरोस्पेस के सीनियर फैलो डगलस बेरी ने कहा, ‘हमारे पास पहले ऐसा माहौल था कि हम जो चाहें हवा में कर सकते थे, पर जो चीन ने किया है उसके बाद अब ऐसा संभव नहीं होगा।’ इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी कमांडरों को अब पायलटों और एयरक्राफ्ट को होनेवाले संभावित नुकसान पर भी गौर करना होगा, जो 80 के दशक में उनके लिए जरूरी नहीं था।

हालांकि अमेरिका की एयर फोर्स अब भी सबसे शक्तिशाली है। चीन ने काफी महत्वपूर्ण समय में प्रगति की है और ऐसे में अमेरिका की ग्लोबल पुलिसमैन बने रहने की इच्छा कमजोर हुई है। इस बीच, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कई महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट शुरू किए हैं, जिसके तहत रोबॉटिक्स और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसी इंडस्ट्रीज में दबदबा कायम किया जा सके। यह एक तरह से विवादित दक्षिण चीन सागर और दूसरे क्षेत्रों में उसके हितों को भी मजबूत करता है।

दरअसल, एक समय ऐसा था जब रूस और चीन अमेरिकी एयर फोर्स की ताकत देख दंग रह गए थे और उन्हें अपनी फोर्स को मजबूत करने के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ा। चीन के लिए पहले गल्फ वॉर के दौरान वह समय आया जब अमेरिकी एयर कैंपेन ने इराकी मिलिटरी को पूरी तरह से तबाह कर दिया। रूस को 1999 में अपनी फोर्स की ताकत के बारे में सोचना पड़ा जब अमेरिका के नेतृत्व में की गई बमबारी ने सर्बिया को सैनिकों और टैंकों को अपने ही प्रांत कोसोवो से हटाने को मजबूर कर दिया।

ताइवान, जिसे चीन अपना प्रांत मानता है वह भी उसके लिए एक बड़ा फैक्टर है। अमेरिका ने 1996 में चीन के साथ तनाव बढ़ने पर उसकी मदद के लिए 2 एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप्स देने की पेशकश की थी और 2008 से वह आर्म्स में 18 अरब डॉलर की मदद कर चुका है।

इसलिए सोचने पर मजबूर हुआ चीन?
दरअसल, चीन के लिए चिंता की बात यह थी कि एयर-टु-एयर मिसाइलें जिनकी कीमत भले ही 1 या 2 मिलियन डॉलर हो पर ये 150 मिलियन डॉलर के एयरक्राफ्ट को तबाह करने की क्षमता रखती हैं। अमेरिका का मुकाबला करने के लिए चीन के लिए यह जरूरी हो गया था। चीन का डिफेंस बजट रूस या भारत की तुलना में 3 गुना से भी ज्यादा है। हालांकि इतने पर भी अमेरिका के रक्षा खर्च 610 अरब डॉलर के मुकाबले यह काफी कम है।

अमेरिकी एयर फोर्स के पास एयर-टु-एयर मिसाइलें हैं, जो दुश्मन के प्लेन्स को 160 किमी दूर से ही गिरा सकती हैं। हालांकि चीन के पास PL-15 है जिसकी रेंज कहीं ज्यादा करीब 300 किमी है। रेडार के कारण फाइटर जेट्स का इलाके में घुसना मुश्किल हो जाता है। अभी रूस भी अपनी मिसाइलों में ऐसी तकनीक नहीं लगा पाया है। जब PL-15 का पहली बार परीक्षण हुआ था तो तत्कालीन अमेरिकी एयर फोर्स की एयर कॉम्बैट कमांड के चीफ हरबर्ट हॉक ने गंभीर चिंता जताई थी।

चीन ने कुछ मिसाइलें रूस के सहयोग से भी तैयार की हैं, जिसे बेहतर माना जा रहा है। चीन सस्ते और छोटे हथियारों को गरीब देशों को बेचता रहा है पर संख्या के हिसाब से वह अब दुनिया का तीसरा आर्म्स ट्रेडर बन गया है। अमेरिका ने जिन देशों को ड्रोन तकनीक देने मना कर दिया, चीन उन्हें आर्म्ड ड्रोन बेच रहा है।

भारत के लिए क्या है टेंशन?
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि रूस अब चीन को सप्लाइ कर रहा है और पेइचिंग पाकिस्तान को सप्लाइ कर रहा है और इससे क्षेत्र में नए समीकरण बने हैं। चीन और पाकिस्तान ने मिलकर JF-17 फाइटर बनाया है, जिसे इंजन रूस ने दिया है। इसे भी रेडार से सुसज्जित किया जा रहा है, जिससे लंबी दूरी पर ही खतरे को भांपकर उसे तबाह किया जा सके।

2003-07 तक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की सहायक सचिव रहीं राजेश्वरी पिल्लई राजगोपालन ने कहा कि रूस ने जब चीन को अपने जेट इंजन्स को पाकिस्तान को रीसेल करने की मंजूरी दी तो यह मुद्दा साप्ताहिक मीटिंग्स में अक्सर उठता था। अगर पाकिस्तान के जेट्स नए रेडार और चीन की PL-10 मिसाइलों से लैस होते हैं तो भारत के पुराने रूसी मिग के लिए उनका मुकाबला करना काफी मुश्किल हो सकता है।

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