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विधानसभा चुनाव: BJP के पास 370, विपक्ष के तरकश में कौन से तीर?

मुंबई/चंडीगढ़

चुनाव आयोग ने शनिवार को महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं। फिलहाल पार्टी के सामने बड़ी चुनौती अपने किले को बचाए रखने की होगी। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की थी। विपक्ष पहले ही लाचार नजर आ रहा था। माना जा रहा है कि पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 समाप्त करने के बाद आए बदलाव के चलते विपक्ष बेहद कमजोर हो चुका है। आपको बता दें कि 2 राज्यों के विधानसभा चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब केंद्र सरकार ने हाल ही में अनुच्छेद 370 और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसले लिए हैं।

महाराष्ट्र : दो गठबंधन होंगे आमने-सामने
पिछले चुनाव में महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़े थे। 2014 में बीजेपी को जहां 122 सीटें मिली थीं, वहीं शिवसेना ने 63 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली थीं। इस बार राज्य में चुनाव दो दलों के बीच न होकर दो गठबंधनों के बीच तय माना जा रहा है। एक ओर बीजेपी-शिवसेना साथ होंगे तो दूसरी ओर कांग्रेस-एनसीपी के साथ एसपी, स्वाभिमान पार्टी, लेफ्ट के दल होंगे। राज्य की कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय भी हो सकता है।

लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और प्रकाश आंबेडकर के बीच हुए समझौते से बने दल वंचित आघाडी ने विपक्ष खासकर कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था। वंचित आघाडी के चलते दलित और कुछ सीटों पर अल्पसंख्यक वोट खिसकने से कई सीटों पर कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। माना जा रहा है कि इस बार ओवैसी और आंबेडकर के बीच बात न बनने के कारण तीसरा मोर्चा पहले जैसी चुनौती भरा नहीं रहेगा।

कांग्रेस-NCP नेता छोड़ रहे पार्टी
महाराष्ट्र में फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने अपनी पकड़ बनाई है। पिछले 4 साल तक सहयोगी शिवसेना भले ही विपक्ष की भूमिका अदा करती रही हो, लेकिन लोकसभा चुनाव और आर्टिकल 370 के बाद बने माहौल को देखते हुए शिवसेना का रुख भी अब नरम दिख रहा है। दूसरी ओर, जिस तरह से कांग्रेस और एनसीपी से नेता निकल-निकल कर बीजेपी और शिवसेना में जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी सत्तारूढ़ धड़े का मनोबल और आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ है। पिछले कुछ समय में कांग्रेस और एनसीपी दोनों ही दलों का जमीनी आधार कमजोर हुआ है, वहीं दोनों पार्टियों में आपसी गुटबाजी, सत्ता को लेकर खींचतान, शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर असमंजस और अनिश्चितता की स्थिति के चलते आम लोगों के बीच इनकी छवि और विश्वसनीयता काफी कम हुई है।

शरद पवार के लिए भी अहम
यह चुनाव एनसीपी चीफ शरद पवार के लिए भी काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके नतीजों पर सिर्फ विपक्ष का ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी और उससे भी ज्यादा खुद उनका राजनैतिक वर्चस्व टिका हुआ है। यूं तो विपक्षी गठबंधन की पूरी कोशिश सत्ता वापसी की रहेगी, लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरणों और परिस्थितियों को देखते हुए स्थितियां सत्तारूढ़ दल के साथ खड़ी दिखाई देती हैं।

हरियाणा : मनोहर लाल खट्टर ने बनाई पैठ
हरियाणा की बात की जाए तो वहां तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद पिछले पांच साल में सीएम मनोहर लाल खट्टर ने अपनी पैठ बना ली है। 2014 के असेंबली चुनावों में बीजेपी को जहां 90 में से 47 सीटें मिली थीं, वहीं कांग्रेस को 15 सीटें हासिल हुई थीं, जबकि चौटाला परिवार नीत आईएनएलडी को 19 सीटें आई थीं। हरियाणा मे चौटाला परिवार में हुए दोफाड़ के बाद आईएनएलडी जहां मरणासन्न स्थिति में है, वहीं दोफाड़ से निकली अभय चौटाला धड़े की पार्टी जेजेपी अभी भी अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में आईएनएलडी के कमजोर और टूटने के बाद विपक्ष की पूरी जमीन अब कांग्रेस के लिए खुली है।

हुड्डा-शैलजा के कारण कांग्रेस में जोश
पिछले पांच साल तक लगातार आपसी खींचतान, गुटबाजी और कलह से जूझती कांग्रेस इस मौके का कितना फायदा उठा पाएगी, कहना मुश्किल है। हरियाणा में कांग्रेस अभी भी अपनी जीत से ज्यादा अपनी हार के लिए मेहनत करती दिखाई दे रही है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस की कमान पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा और पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के आने के बाद पार्टी में एक जोश तो आया है, लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि बीजेपी ने जिस तरह से वहां गैर जाट माहौल बनाया है, उसे देखते हुए हरियाणा की जनता कहां तक कांग्रेस के दलित-जाट प्रयोग पर भरोसा कर पाती है, कहना मुश्किल होगा।

हरियाणा में बीएसपी बिगाड़ेगी खेल
हरियाणा में कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि बीएसपी ने यहां अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। हरियाणा के कुल मतदाताओं में 19% दलित हैं। 2014 में बीजेपी ने राज्य की 17 एससी रिजर्व सीटों में से 8 सीटें जीतीं थीं। यानी, कांग्रेस को दलित मतदाताओं को रिझाने में बीजेपी और बीएसपी से तगड़ी टक्कर मिलेगी। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा ‘कांग्रेस हमेशा की तरह इस बार भी पूरी मजबूती से ऐसे मुद्दे उठाएगी जिन मुद्दों से सरकार आपका, हम सबका ध्यान हटाने की कोशिश करती आई है।’

खेड़ा ने कहा कि कांग्रेस चुनाव प्रचार के दौरान महाराष्ट्र और हरियाणा के किसानों की स्थिति, आर्थिक सुस्ती के कारण नौकरियां जाने और स्टॉक मार्केट में गिरावट के सवाल आम जनता के बीच ले जाएगी। खेड़ा ने कहा, ‘हम इस सरकार की नीतियों के कारण पिछले तीन महीनों में 15 लाख लोगों की नौकरियां जाने की बात करेंगे। 20 लाख करोड़ रुपये जो स्टॉक मार्केट में पिछले कुछ महीनों में डूबा है, इसको उठाएंगे।’

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