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बाबूलाल मरांडी पर BJP क्यों लगा रही दांव?

रांची

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और एक समय प्रदेश की राजनीति का कद्दावर चेहरा रहे बाबूलाल मरांडी की आज ‘घर वापसी’ हो गई है। बाबूलाल मरांडी ने आज अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का भारतीय जनता पार्टी में विलय कर दिया। मरांडी ने यह फैसला इसी महीने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद लिया है। सोमवार को रांची में एक कार्यक्रम के दौरान बाबूलाल मरांडी इस विलय की औपचारिक घोषणा की।

अमित शाह ने जेवीएम का बीजेपी में विलय होने पर बाबूलाल मरांडी का स्वागत किया। विलय होने पर अमित शाह ने कहा, ‘मुझे खुशी है कि बाबूलाल मरांडी बीजेपी में लौट आए हैं, मैं 2014 से उनकी वापसी के लिए काम कर रहा था।’ बाबूलाल मरांडी ने 2006 में बीजेपी से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) के नाम से नई पार्टी का गठन किया था।

संघ से जुड़ी हैं मरांडी की जड़ें, बीजेपी में ‘घर वापसी’
बाबूलाल मरांडी झारखंड की राजनीति का एक कद्दावर चेहरा रहे हैं। दोनों पार्टियों का विलय ऐसे समय पर हो रहा है जब बीजेपी हाल ही में सत्ता से बाहर हुई है और जेवीएम हद से ज्यादा कमजोर है। चार बार के लोकसभा सांसद और अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे बाबूलाल मरांडी की राजनीतिक जड़ें संघ से जुड़ी हुई हैं। साल 2000 में बिहार से अलग होकर बने नए राज्य झारखंड के वह पहले मुख्यमंत्री रहे। इस तरह बीजेपी में उनकी पार्टी के विलय के फैसले को उनकी घर वापसी के तौर पर देखा जा रहा है।

शिबू सोरेन को हराकर बने बीजेपी का चेहरा
1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बाबूलाल मरांडी को झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन के खिलाफ टिकट दिया था। हालांकि वह महज 5000 वोटों के अंतर से हार गए। बीजेपी ने इसके बाद उन्हें राज्य बीजेपी अध्यक्ष बना दिया। इसी बीच उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ी बीजेपी को झारखंड क्षेत्र की 14 में से 12 सीटों पर जीत मिली। इस चुनाव में मरांडी ने भी शिबू सोरेन को हरा दिया। इस जीत से उनका राज्य की राजनीति में कद काफी बढ़ गया।

बीजेपी से दूरी की यह रही बड़ी वजह
1998 में बड़ी जीत और केंद्र में मंत्री बनने के बाद साल 2000 में उन्हें नवगठित राज्य झारखंड का मुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि वह मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर पाए और जेडीयू जैसे गठबंधन सहयोगियों के दबाव में उन्हें 2003 में सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनकी जगह अर्जुन मुंडा राज्य के सीएम बने। इसके बाद से वह झारखंड की राजनीति से दूरी बनाने लगे।

बीजेपी से अलग होकर भी छोड़ी छाप
2004 के लोकसभा चुनाव में वह बीजेपी के टिकट पर कोडरमा से चुनाव जीते, मगर 2006 में उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनके साथ 5 अन्य विधायकों ने भी पार्टी छोड़ दी। इसे बीजेपी के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा गया। उपचुनाव में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और कोडरमा से फिर से जीत हासिल की। इसी दौरान उन्होंने अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का भी गठन कर लिया। 2009 के लोकसभा चुनाव में वह यहां से जेवीएम के टिकट पर एक बार और जीते, मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने वह नहीं टिक पाए और चुनाव हार गए।

मरांडी पर बीजेपी क्यों लगा रही दांव?
बीजेपी झारखंड की सत्ता गंवाने के बाद ऐसा आदिवासी चेहरा तलाश रही है, जिसकी संथाल क्षेत्र में अच्छी खासी पकड़ हो। बीजेपी के धाकड़ आदिवासी नेताओं में अर्जुन मुंडा की पैठ कोल्हान क्षेत्र में है, जहां हालिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। इस साल बिहार और अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल से लगे झारखंड में आदिवासी मतदाताओं को लुभाने के लिए मरांडी बीजेपी का चेहरा बन सकते हैं। वह बीजेपी में शामिल होने के बाद झारखंड में नेता प्रतिपक्ष या फिर मोदी सरकार में मंत्री बन सकते हैं। मरांडी फिलहाल धनवर से विधायक हैं।

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