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कोरोना वायरस से भारतीय योग और आयुर्वेदिक पद्धति से बचाव

आज विश्व कोरोना वायरस जिसके फलस्वरूप चीन के बोहान शहर में दिसम्बर 2019 के अंत में मौत हुई और आज संपूर्ण विश्व इस वायरस से भयभीत है और मृत्यु से बचाव के तरीके जानना चाह रहा है। विज्ञान ने इसे अकोशीय विषाण वायरस कहा जो क्रिस्टल रूप में सुप्त अवस्था में विद्यमान है। इसकी उपत्ति कैसे आया और कैसा बना विज्ञान खोज रहा है।

सूक्ष्म जीवाणु की खोज 1880 में हुई। तभी से आज तक इस विषाणु उपस्थिति नहीं पाई गई। इसी लिए वल्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन ने इसे नोवल कोरोना वायरस नामकरण दिया है। कोरोना शब्द क्राउन से उत्पन्न है। अत: ताज की शक्ल में क्रिस्टल रूप में पाया जाता है। अब यह मृत्यु का कारक बना हुआ है, तो हमें मृत्यु को विज्ञान क्या बताता है समझें। ‘Spontenious Flow Of High Energy Phosphate Into the cell And Flow Energy Phosphate From The Cell Is Known As Life And Ceasetion Of Flow Is Called Death’ (उच्च उर्जा के फासफेट जीव की कोषा में सहजता से प्रवेश करते हैं और न्यून उर्जा के फासफेट बाहर आते हैं। इसे ही जीव से जानते हैं। इसका रुक जाना ही मृत्यु कहलाती है।) इस क्रिया को स्थूल रूप से श्वास-प्रश्वास से सहजता से चालू रखा जाता है। इस विषाणु के प्रभाव से श्वास-प्रश्वास में अवरोध हो रहा है।

अब प्रश्न उठता है कि यह प्रवेश कैसे कर गया, जबकि जीवाणु की कोषा में बिजातीय अर्थात मृत्यु कारक सूक्ष्म जीव एक से अनेक बनने लगता है। जिसमें कोषागत आरएनए और डीएनए के साथ प्रोटीन का उपयोग होता है जिससे कोषागत सान्द्रता जीवनीय घटकों की कम होकर मृत्यु हो जाती है। शरीर की बाहरी सतह पर सूक्ष्म जीव सुसुप्त अवस्था में रहता है। अब पुन: प्रश्न उठता है कि यह कोषा तक पहुंचा तो हमारे शरीर के सैकेंड द्वार ही है जिसमें दो आखें, दो कान, दो नाक के छिद, एक मुंह, एक नाभि, एक मूल, एक लिंग, एक त्वचा।

हमारे शरीर में आत्मा रूपी चेतना इन्हें प्रवेश को रोकती है और परास्त होने पर द्वारों पर लक्षण प्रतीत होते हैं। जिन लक्षणों से रोग निदान संभव है। जैसे कोरोना वायरस के लक्षणों आप निदान करेंगे तो चिकित्सा संभव हो जाएगी।

कोरोना वायरस के लक्षण जो मिल रहे हैं-
. भ्रम की स्थिति
. छींक आना
. बुखार
. नाक का बहना
. श्वास लेने में अवरोध
. आरबीसी और डब्ल्यूबीसी पर प्रभाव
. रक्त की प्लेटलेट पर प्रभाव
. हीम्योग्लोबिन पर प्रभाव
. लीवर क्षतिग्रस्त
. गुर्दे पर प्रभाव आदि

इनका उपचार आज की विकसित चिकित्सा अर्थात औषधि से संभव नहीं हो रहा है। इसका हल हमें वेद, आयुर्वेद और योग से संभव दिखाई देता है, क्योंकि आज की चिकित्सा दो द्रवों पर विकसित है परंतु वेदों में चार कारण द्रवों को भी माना है। वह हैं दिशा, काल, आत्मा और मन। जब तक आज का चिकित्सा विज्ञान सभी 9 द्रवों को यथा योग्य महत्व नहीं देगा चिकित्सा में सफलता मिलना असंभव है।

आयुर्वेद चिकित्सा सिद्धांत अनुसार
आयुर्वेद से मृत्यु पर विजय प्राप्त कर अमृत निर्माण कर मनुष्यको अमर कर दिया और अनेक औषधियों को मनुष्य जाति के लिए उत्पन्न कर वेदों में वर्णन किया। जैसे मनुष्य को यजुर्वेद में वयु प्रधान और अग्नि प्रधान औषधियों से उन रोगों पर विजय प्राप्त की जो मनुष्य को मृत कर ही पीछा छोड़ती है। जैसे पारकिनसन, थायोराइट, अर्थोराइटिस, रक्त चाप एवं डायवटीज जैसी अनेक बीमारियां है जिनके लिए Life Time Preventive और Promotive औषधियों को लेना पड़ता है। ऐसी बीमारियों के लिए जो तत्काल मृत करेंगी उनके लिए।

इन ऋचाओं से चिकित्सा संभव है। इसमें सर्वप्रथम औषधि को संस्थारित कर भावना देना होगी। जिससे मन चेतन होगा अर्थात औषधि जड़ से चेतन होगी। औषधि की दिशा और काल के ज्ञान से तीन कारक द्रव की कमी पूर्ण कर आत्मा को सुरक्षित किया जा सकता है। इन विषाणुओं को ब्रह्मांडीय तत्व जिससे इसे बताया जो सोना है इसकी उपस्थिति जैविक कोषा में पहुंचाकर इन विषाणुओं से हानि होने को रोका जा सकता है।

आचार्य हुकुमचंद शनकुशल
भारतीय योग अनुसंधान केन्द्र के
संपर्क:- 9981357730, 9303112694

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