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जब हाथ जोड़कर खड़े हो गए साहब

भोपाल

भेल के व्यापारियों की दुकानों की लाइसेंस फीस व उद्योग नगरी में कामकाज को लेकर भोपाल कलेक्टर और कमिश्नर ने भेल नगर प्रशासन विभाग के अधिकारियों की व्यापारियों के साथ बैठक आहूत कर डाली। मुद्दा काफी पुराना है एक ओर भेल प्रबंधन बढ़ी हुई लाइसेंस फीस के लिए अड़ा हुआ है तो दूसरी ओर व्यापारी भी आर पार की लड़ाई का मूड बना चुके हैं। दूसरी ओर उद्योग नगरी में नए अफसरों के आते ही अतिक्रमण की बाढ़ सी आ गई है। इसको लेकर नगर प्रशासन के मुखिया जब कलेक्टर कमिश्नर के सामने बड़े बोल बोलने लगे तब उन्हें जमकर फटकर सुननी पड़ी। बेचारे नए साहब फटकार सुनने के बाद माफी मांगते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गए। ऐसे में यह तो समझ में सबको आ गया कि भेल प्रशासन ने ऐसे अफसरों को नगर प्रशासन विभाग की कमान सौंप दी जिन्हें उद्योग नगरी के संबंध में कोई कानूनी जानकारी ही नहीं है। यूं भी इन अफसरों की शिकायतें सिर्फ कर्मचारी ही नहीं बल्कि यूनियन नेता भी जीएम एचआर से करने लगे हैं। चर्चा है कि 31 मार्च के बाद नगर प्रशासन विभाग के कुछ गैर जिम्मेदार अफसर नप सकते हैं।

अब भेल में होगा एमपी आरआई एक्ट लागू

मध्य प्रदेश सरकार ने भेल में लागू इंडस्ट्री डिस्प्यूट एक्ट आईडी एक्ट को खत्म कर एमपी आरआई एक्ट लागू कर दिया है। खबर है कि इसका आदेश भी भेल के मानव संसाधन विभाग को भेल दिया है और इस विभाग ने प्रतिनिधि यूनियनों को इस आदेश की प्रति भी थमा दी है। इसको लेकर भेल की यूनियनों में हड़कंप मचा हुआ है। चर्चा है कि यह एक्ट लागू होने के बाद भेल कर्मचारियों द्वारा चुनी गई नम्बर वन यूनियन इस एक्ट के मुताबिक भेल प्रबंधन की हर बैठक में भाग ले सकेगी। सवाल यह खड़ा हो गया है कि वर्ष 2007 में चुनी गई नम्बर वन प्रतिनिधि यूनियन या इसके बाद चुनी गई नम्बर वन यूनियन भेल का प्रतिनिधित्व करेगी या कोई और रास्ता तलाशा जाएगा इसको लेकर प्रबंधन और कुछ यूनियनें आमने सामने है। चर्चा है कि इस एक्ट को लेकर दो नम्बर यूनियन के नेता ने तो मानव संसाधन विभाग के एक अपर महाप्रबंधक को खरी खोटी सुना डाली। नेताजी ने यह तक कह डाला कि यह तो एक्ट का सर्कुलर बांट रहे हो, लेकिन प्रबंधन का सर्कुलर क्यों नहीं बांटा। दरअसल 21 मई 21 को फिर से प्रतिनिधि यूनियन के चुनाव होना है। यदि ये एक्ट लागू हो गया तो नम्बर वन यूनियन ही भेल का प्रतिनिधित्व करेगी और वह जिसे चाहेगी पिछलग्गू यूनियन बना डालेगी। देखना यह है कि यह यूनियनें आगे क्या रणनीति बनाती हैं।

क्या कस्तूरबा अस्पताल को भी होगा निजीकरण

यूं तो सार्वजनिक क्षेत्र की भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड भेल जैसी महारत्न कम्पनी के निजीकरण को लेकर चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही है, तो दूसरी ओर भेल के प्रतिष्ठित कस्तूरबा अस्पताल को निजी हाथों में सौंपने की चर्चाएं भी शुरु हो गई हैं। दरअसल हरिद्वार यूनिट में अपने अस्पताल को निजी हाथों में सौंपने का टेंडर तक निकाल डाला। इसको लेकर कारपोरेट प्रबंधन भोपाल यूनिट के कस्तूरबा अस्पताल को भी निजी हाथों में सौंपने का मन बना रहा है। यह कहा जा रहा है कि हरिद्वार के अस्पताल में 300 से ज्यादा बिस्तरों वाला अस्पताल है तो साफ संकेत है कि इसे किसी बड़ी पार्टी को ही सौंपा जा सकता है। बड़ी बात तो ये भी है कि एक समय कस्तूरबा 450 बिस्तरों वाला अस्पताल था तो आज भले ही इसकी संख्या कम हो गई हो उस पर भेल कर्मचारियों को सही इलाज भी मुहैया नहीं हो पा रहा है तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि कस्तूरबा को भी निजी हाथों में सौंपकर भेल प्रशासन अपना हाथ झाड़ लेगा। अब इसमें कितनी दम है ये तो नए वित्तीय वर्ष में ही पता चल पाए। हां यह जरूर है कि जब तक कम्पनी का ट्रस्ट जिसके पास दो हजार करोड़ का हेल्थ फंड है तब तक मरीजों का इलाज सुचारू रूप से चलता रहेगा। आगे भगवान ही मालिक है।

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