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भोपाल से दिल्ली : पहली बार इस ट्रेन की आधी सीटें खालीं

भोपाल.

जो ट्रेन पहले यात्रियों से ठसाठस भरी होती थी। जिसके जनरल कोच में सांस लेना भी दूभर हो जाता था और वेटिंग और आरएसी के लिए भी लंबी लाइन लगती थी, वही शान-ए-भोपाल एक्सप्रेस, हबीबगंज से हजरत निजामुद्दीन, सोमवार को जब हबीबगंज से निकली तो 50% खाली रही।

ट्रेन में सफाई तो खूब थी लेकिन लोगों की रौनक नहीं थी। जगह-जगह डस्टबिन रखे थे। लेकिन उनमें कचरा नहीं था। हर दूसरी सीट खाली पड़ी थी। कुछ केबिन तो पूरे के पूरे खाली थे। जो यात्री सफर कर रहे थे वो भारी दहशत में थे। चेहरे पर मास्क था। साथ में हैंड सैनिटाइजर था। बार-बार यात्री हाथों को सैनिटाइज कर रहे थे।यात्रियों ने सीट पर सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखी, घर से ही चादर लेकर आए।

ट्रेन में इतना सूनापन था कि लोग आपस में भी बातचीत करने से बच रहे थे। एसी के बजाय स्लीपर कोच में फिर भी थोड़ी रौनक थी, लेकिन वहां भी तमाम सीटें खाली पड़ी थीं और लोग एक-दूसरे से बचते नजर आ रहे थे।

खिड़कियों से निकले पर्दे, हेल्पर पीपीई किट में मुस्तैद रहे ट्रेन के एसी कोच में पहले जो पर्दे लगे नजर आते थे, उन्हें कोरोना के कारण हटा दिया गया है। एक भी अटेंडर नहीं है, क्योंकि बेडरोल की सुविधा रेलवे दे ही नहीं रहा। हेल्पर पीपीई किट पहने नजर आए। यही लोग ट्रेन में पानी से लेकर एसी मेंटेन करने तक का काम करते हैं।
ट्रेन में खाली पड़े स्लीपर कोच के डिब्बे।

पीपीई किट पहने दिखे मैकेनिक सुनील कुमार ने बताया कि आज हमारा कुल पांच लोगों का स्टाफ ट्रेन में है। इसमें 3 हेल्पर हैं और दो मैकेनिक। किट पहली बार पहनी है, तो घबराहट हो रही है। पूरा पसीने से भीग चुका हूं लेकिन कोरोना का डर इतना है कि किट की चेन खोलने की हिम्मत भी नहीं हो रही।

सुनील ने यह भी बताया कि हम लोगों ने एसी का टेम्परेचर भी 25° पर सेट किया है, हालांकि यदि कहीं से डिमांड आएगी तो कम कर देंगे। लेकिन हमें बताया गया है कि इतना ही टेम्परेचर रखें। आप ड्यूटी कर रहे हैं तो घरवाले चिंता में हैं? ये पूछने पर बोले कि साहब मेरी पत्नी और तीन बच्चे हैं। सब इसी चिंता में हैं कि कोरोना न हो जाए। हालांकि, ड्यूटी तो करनी ही है, इसलिए पीपीई के साथ मैदान में जुट गए हैं।

सुनील के साथी हेल्पर हरी सिंह ने बताया कि पहली बार अगले दिन का खाना लेकर भी हम चल रहे हैं। पानी भी पांच-पांच लीटर रख लिया है, ताकि बाहर से भरने की नौबत न आए। सुनील की बेटी महज दो साल की है। जो उत्तरप्रदेश के उरई में अपनी मां के साथ फंसी है।

सुनील बोले, लॉकडाउन की वजह से परिवार आ नहीं पाया। आज से मेरी ड्यूटी शुरू हुई तो मम्मी ने खाना बनाकर दिया। बाहर का नहीं खाना, इसलिए कल तक का रख लिया। हेल्पर शशिकांत सिंह कहते हैं, बहुत गर्मी है, इसलिए खाने के लिए सब सूखे आइटम रखे हैं, ताकि कल रात तक खराब न हों।

8 के बजाए 3 ही टीटीई, स्लीपर में कोई नहीं
ट्रेन में 8 के बजाए 3 ही टीटीई थे। स्लीपर में कोई टीटीई नहीं था। पिछले दस साल शान-ए-भोपाल में ही ड्यूटी कर रहे टीटीई जगदीश पाठक बोले कि बहुत सा स्टाफ स्टेशन पर लगाया गया है। टिकट चेकिंग और यात्रियों के नाम, नंबर वहीं दर्ज किए जा रहे हैं इस कारण भी ट्रेन में टीटीई कम हैं।

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