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सरकार बदली समझो भेल में एक्ट खत्म

भोपाल

भेल कारखाने में लागू एमपीआरआई एक्ट और आईडी एक्ट के बीच नियमित कर्मचारी व श्रमिक फुटबाल बने हुए हैं। कहने को तो सरकार ने इसे मजदूर हितैषी एक्ट बनाया है लेकिन यह दोनों ही एक्ट राजनीति का शिकार बन रहे हैंए इसके चलते भेल प्रबंधन को भी बार.बार एक नये एक्ट के तहत काम करना पड़ता है। 32 साल एक ही यूनियन ने एमपीआरआई एक्ट के तहत भ्ेाल कारखाने में सत्ता सुख भोगा फिर प्रदेश में भाजपा सरकार के आते ही इस एक्ट को नौ दो ग्यारह कर दिया। इसके बाद कारखाने में इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट यानी आईडी एक्ट लागू कर दिया। फिर क्या था देखते ही देखते 32 साल बाद भेल कारखाने में प्रजातांत्रिक तरीके से चुनाव भी सम्पन्न हुए। चुनाव में एचएमस यूनियन ने भी नंबर वन रहकर सत्ता सुख भोगा और वर्ष 2016 के चुनाव में फिर से इंटक ने कब्जा कर लिया। इसी बीच कांग्रेस सरकार के आते ही एमपीआरआई एक्ट को लागू कर दिया गया तो ऐसा लगने लगा कि अब फिर से इंटक का राज हो गया। मजेदार बात तो यह है कि जैसे ही कमलनाथ सरकार गई तो भाजपा ने फिर से भेल कारखाने को एमपीआरआई एक्ट से बाहर कर दिया। चर्चा है कि अब फिर से प्रतिनिधि यूनियन के चुनाव होने की अटकलें लगने लगी है। अब कर्मचारी व भेल प्रशासन सरकार द्वारा बार.बार एक्ट बदलने को लेकर परेशान है।

और जवाहर बाग के आम की नीलामी

सालाना लाखों खर्च कर जवाहर बाग के रखरखाव पर किये जाते हैं। आम के नाम पर नगर प्रशासन विभाग ठेके तो दे देता है लेकिन इसकी सच्चाई ठेकेदार और नगर प्रशासन के अफसर ही जानते हैं। दरअसल इस पर भेल के एक सुपरवाइजर सहित जितने भी कर्मचारी काम करते हैं उतनी आय भी इस बाग से नहीं होती दूसरी और भेल खर्चे में कटौती की बात कर रहा ैहै। आम के सीजन में ठेकेदार ने ठेका तो ले लिया लेकिन बाग में इतने आम भी नहीं हैं कि वह बाहर आसानी से बेच सके। इसके लिए वह बाग के आम की जगह बाहर से आम खरीदकर बाग के सामने बेच रहा है। चर्चा है कि लोग आज भी बाग के ताजे आम समझकर मजे से खरीद रहे हैं इस पर हाल यह है कि जिस आम को बाग के अंदर बेचना चाहिए उसे बाहर बेचने का किराया भी यहां के एक इंचार्ज वसूल रहे हैं। इसका किराया किस खाते में जा रहा है इसका अता.पता तक नहीं है। किसका क्या लाभ शुभ है यह तो वही जाने लेकिन सिर्फ आम के बाग की ही नीलामी हुई थी न कि बाहर बेचने की।

मसाला पापड़ केन्द्र में एक ही परिवार के दस लोग

भेल लेडिज क्लब द्वारा संचालित मसाला पापड़ केन्द्र और वाटिका की भी अजीबो गरीब कहानी है। क्लब को भेल कर्मचारियों की मृत्यु होने के बाद उनके परिजनों को प्राथमिकता के आधार पर नौकरी पर रखना चाहिए लेकिन उससे उलट सिफारिश वाले लोग ज्यादा काम पर आ रहे हैं तो साफ जाहिर है कि क्लब अपने मूल उद्धेश्य से भटकने लगा है । लोग कहने लगे हैं कि नये मुखिया एक बार खुद इसके नियमों का अध्ययन तो कर लें। दरअसल यूं तो इस जगह पर मार्च एंड के बाद कई कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था लेकिन जिस पर प्रबंधन मेहरबान है उन्हें फिर से नौकरी पर ले लिया। चर्चा है कि प्रबंधन की मेहरबानी से सालों से एक ही परिवार के दस लोग न केवल यहां नौकरी कर रहे हैं बल्कि लाखों के ठेके भी मजे से लेते आ रहे हैं। भले ही लॉकडाउन में तीन माह से वाटिका के माध्यम से कारखाने में पहुंचने वाला नाश्ता बंद है तो ऐसे में यह कर्मचारी किसके घरों में नाश्ता पहुंचा रहे हैं यह अलग बात है।

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