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तो क्‍या कबाड़ में बदल चुके हैं रूस के कई हथियार, क्‍या वाकई भारत के लिए है चिंता की बात

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मॉस्‍को

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद उसके पास मौजूद हथियारों पर सवाल उठने लगे हैं। टैंक, बख्‍तरबंद गाड़‍ियां और रूस की वायुसेना की असफलता, काला सागर में रूस के जहाज का डूबना, ये सब रूस की मिलिट्री के पास मौजूद पुराने हथियारों की पोल खोल देते हैं। मिलिट्री एक्‍सपर्ट्स की मानें तो रूस के कई हथियार ऐसे हैं जो सोवियत दौर के हैं और जिन्‍हें अपग्रेड तक नहीं किया गया है। वो मानते हैं कि रूस के हथियारों का जखीरा अब कबाड़ बन चुका है और अगर ऐसा है तो फिर यह भारत के लिए परेशान होने वाली बात है।

किसी जमाने में मास्‍टर था रूस
भारत अपने रक्षा संसाधनों के लिए रूस पर निर्भर है। यूक्रेन युद्ध के समय जहां कुछ परेशानियां खराब कमांड और ट्रेनिंग की वजह से आईं तो काफी घटनाएं ऐसी थीं जिनमें खराब हो चुके हथियारों का पता लगा। सोवियत दौर के समय रूस ने अपने हथियारों का निर्माण किया। उसके हथियार हालांकि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के मुकाबले कमजोर थे लेकिन फिर भी रूस ने अपनी सर्वश्रेष्‍ठता साबित की। द्वितीय विश्‍व युद्ध के समय ही रूस अपना लड़ाकू विमान जैसे याक-3, लावोशेकिन LA-7 आईएल-2 स्‍टॉर्मोविक दुनिया के सामने लेकर आ गया था।

रूस ने दुनिया को टी-34 जैसा सफल टैंक दिया जोकि पहला मॉर्डन युद्धक टैंक था। इस टैंक में जो सस्‍पेंशन लगा था उसे अमेरिका के जे वॉल्‍टर क्रिस्‍टी ने डिजाइन किया था। इसके अलावा रूस ने कई प्रभावी वॉरशिप्‍स, परमाणु पनडुब्बियां, लड़ाकू और बॉम्‍बर एयरक्राफ्ट, मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम और हर तरह के रॉकेट और मिसाइल तैयार किए। सन् 1970 और 1980 तक रूस डिफेंस मार्केट का बादशाह था।

अमेरिका ने की बराबरी की कोशिश
अमेरिका ने साल 1982 में पहली बार रूस के रक्षा उपकरणों की बराबरी करने की कोशिश की। इस बार उसने रक्षा बजट के जीडीपी का 6.8 फीसदी तक कर दिया था। कुछ समय तक आंकड़ा यही रह और फिर साल 2000 में इसे कम कर दिया। सोवियत संघ के टूटने के बाद रक्षा बजट में 3.2 फीसदी की गिरावट भी देखी गई। अमेरिका के पास एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी होने का फायदा है। उसके पास ऐसी टेक्‍नोलॉजी है जो माइक्रो-इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स और कंप्‍यूटर्स से जुड़ी है। ऐसे मैटेरियल्‍स हैं जो जेट इंजन के निर्माण के लिए तो बहुत जरूरी हैं ही साथ ही साथ एयरक्राफ्ट और मिसाइल के लिए भी जरूरी हैं।

बर्बाद हो गई रूस की इंडस्‍ट्री
सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस की डिफेंस इंडस्‍ट्री भी बर्बाद हो गई। रूस उस समय कई तरह की आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था। उसकी मुद्रा रूबल भी गिरती जा रही थी और हजारों रक्षा कर्मियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ गया था। साल 1991 से 2010 तक रूस, मिलिट्री पर जीडीपी की दो फीसदी से भी कम रकम खर्च करता था। उसकी जीडीपी भी हिली हुई थी। रूस के रक्षा उत्‍पादन और आधुनिकीकरण पर सबसे खराब असर देखने को मिला। रूस का रक्षा उत्‍पादन अभी तक काफी पिछड़ा है और उसे इस पर खासा ध्‍यान देने की जरूरत है। अटैक जेट्स से लेकर एयरक्राफ्ट मिसाइल पोजिशिनिंग सिस्‍टम सबकुछ पुरान है और हथियारों को अपग्रेड करना ही पड़ेगा।

अमेरिका आधारित सिस्‍टम
नए सिस्‍टम के लिए रूस के पश्चिमी देशों का रुख करना पड़ा था। इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, कैमरा और सेंसर्स के लिए उसे दूसरे देशों की तरफ देखना पड़ा। रूस के पास अच्‍छे थर्मल सेंसर्स से लेकर इंफ्रारेड रडार तक की कमी है। रूस के ड्रोन पश्चिमी और चीनी इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स से मिलाकर बने हैं और इनमें रूसी पार्ट्स बहुत कम हैं। युद्ध के लिए प्रयोग होने वाले सिक्‍योर फोन गैर-रूसी माइक्रोप्रोसेसर्स और ग्राफिक इंजन पर आधारित हैं। रूस इस समय अमेरिकी सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्‍टम की मदद से हथियार तैयार कर रहा है।

यूक्रेन के युद्ध का अंतिम नतीजा जो भी हो, रूस को इस बात पर नजर दौड़ानी ही होगी कि आखिर उसकी असफलता की मुख्‍य वजह क्‍या है? उन लोगों को इसकी जिम्‍मेदारी लेनी जिनकी वजह से युद्ध के मैदान में रूस को मुंह की खानी पड़ रही है। जब तक बदलाव नहीं होंगे तब तक रूस की सेना को हार का सामना करना पड़ेगा।

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