नई दिल्ली
ब्रिटेन ने लिज ट्रस को अपना नया प्रधानमंत्री चुना है। वह देश की तीसरी महिला प्रधानमंत्री होंगी। उनके हाथ में ब्रिटेन की कमान मुश्किल समय में आ रही है। दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से ब्रिटेन बाहर हो चुका है। हाल में भारत ने उसकी जगह ले ली है। देश में महंगाई का बोलबोला है। खाने-पीने की चीजों में आग लगी हुई है। कॉस्ट-ऑफ-लिविंग आसमान छू रही है। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। ईंधन से लेकर दूध के दाम तक में उबाल है। देश के केंद्रीय बैंक पर ब्याज दरों को बढ़ाने का दबाव है। ऐसा करने पर ग्रोथ गच्चा देगी। इधर, कुआं तो उधर खाई जैसी स्थिति है। पूर्व विदेश मंत्री ऋषि सुनक के पीएम बनने का तो लिज ट्रस ने सपना तोड़ दिया है। वह मारग्रेट थैचर (की राह चलने वाली हैं। पर, क्या इससे वह ब्रिटेन की बंटाधार इकनॉमी की हालत को पटरी पर ला सकेंगी? यह काम आज की तारीख में आसान नहीं होगा। 1979 में जब मारग्रेट थैचर ने प्रधानमंत्री का पद संभाला था तब हालात दूसरे थे। उन्होंने सीमित टैक्स मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया था ताकि वित्तीय हालात सुधारे जा सकें। आज ब्रिटेन एक चुनौती से नहीं, चुनौतियों के अंबार पर बैठा हुआ है।
ट्रस ने टैक्स में कटौती, यूरोपीय संघ के कानूनों से छुटकारा पाने और ग्रीन एनर्जी लेवी की वसूली पर रोक लगाने का वादा किया है। इस लेवी के तहत नागरिकों को इकोफ्रेंडली प्रोजेक्ट्स के लिए अपने ईंधन बिल का एक हिस्सा देना पड़ता है। वादे तो अपनी जगह हैं। लेकिन, इन्हें जमीन पर बदलने के लिए पैसा कहांं से आएगा। इसका इंतजाम करना आसान नहीं है।
ब्रिटेन के सामने खड़ी हैं दो बड़ी समस्याएं
अभी ब्रिटेन के सामने दो बड़ी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हुई हैं। पहली है महंगाई। दूसरी है ईंधन की बढ़ती कीमतें। ईंधन की कीमतों का महंगाई की आग भड़काने में अहम किरदार है। लेकिन, ये दोनों समस्याएं अलग-अलग हैं। इनका हल भी अलग-अलग ही निकालना पड़ेगा। कैंपेन के दौरान ट्रस ने आने वाले छह महीनों में ऐसी पॉलिसी फॉलो करने के लिए कहा है जिससे कंपनियां दाम नहीं बढ़ा पाएं। इसकी गंभीरता को थोड़ा ऐसे भी समझ सकते हैं। ट्रस के कार्यभार संभालने से ठीक पहले क्रिस्टीन फर्निश ने ऊर्जा नियामक ऑफगेम के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया।
ब्रिटेन में महंगाई की दर 40 साल में सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी है। जुलाई महंगाई की दर बढ़कर 10 फीसदी हो गई। दूध की कीमतें पिछले एक साल में 40 फीसदी बढ़ गई हैं। ऐसी कई बातें हैं जो संकेत देती हैं कि महंगाई अभी हाल-फिलहाल खत्म नहीं होने जा रही है। साफ है कि ट्रस का फोकस इन पर अंकुश लगाने पर होगा। यह उनके लिए आसान नहीं रहने वाला है। अगर आपको लगता है कि इसके पीछे कोरोना से जुड़ी पाबंदियां और यूक्रेन से जंग है तो गलत सोच रहे हैं।
केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को रखा हुआ है नरम
दरअसल, 2008 के आर्थिक संकट के बाद से बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दरों को नरम रखा हुआ है। इसने लोगों के लिए पैसे की उपलब्धता को आसान किया है। परिवार के खर्च बढ़े हैं। अब महंगाई को देखते हुए केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी होंगी। इसका सीधा सा मतलब होगा कि कर्ज महंगा हो जाएगा। इससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ेगा। रोजगार के मौके घटेंगे।
ब्रिटेन का सेंट्रल बैंक पहले ही चेतावनी दे चुका है। उसने साफ कहा है कि ऊंची महंगाई और बढ़ती ब्याज दरों से ब्रिटेन मंदी में प्रवेश करने वाला है। महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए जो प्रयास होते हैं, उनका सभी पर एक जैसा असर नहींं पड़ता है। इससे दौलतमंदों की बचत में बढ़ोतरी होती है। इसके उलट बिना बचत वाले मंदी के असर को महसूस करते हैं।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी के चलते ट्रस को चुनावी नुकसान होने की आशंका है। ट्रेंड रहा है कि सरकारें महंगाई को घटाने के लिए ब्याज दर बढ़ाने को लेकर आक्रामक रही हैं। ट्रेड यूनियनों के प्रति नई पीएम के नकारात्मक रुख से उनकी सरकार के लिए जनता का समर्थन और कम हो सकता है। ट्रस कह चुकी हैं कि वह जीवन संकट की लागत को दूर करने के लिए ट्रेड यूनियनों के साथ काम नहीं करेगी। इससे देश भर में हड़तालों का लंबा सिलसिला शुरू हो सकता है। कारण है कि मजदूरी महंगाई के मुकाबले कम रह जाएगी। इन सब समस्याओं के साथ नई प्रधानमंत्री को अगले चुनाव में मतदाताओं से भारी समर्थन हासिल करना मुश्किल होगा।
