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पब्लिक में तांडव नृत्य पर क्यों लगा था बैन? हिजाब केस पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में आया जिक्र

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नई दिल्ली

हिजाब मामले पर सुनवाई के दौरान आज सुप्रीम कोर्ट में कुरान की आयतों, खिमार, नमाज, रोजा, जकात, हज से लेकर जबरन धर्मांतरण तक का जिक्र हुआ। कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनने पर रोक के खिलाफ याचिकाकर्ताओं के वकील निजाम पाशा ने बाबरी मस्जिद के फैसले का हवाला भी दिया। मुख्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील देवदत्त कामत ने तर्क रखा कि हिजाब पहनने से किसके मूल अधिकार का हनन हो रहा है? एक पर एक दलीलें पेश करते हुए कामत ने आनंद मार्गी केस का भी जिक्र किया, जब तांडव नृत्य (Tandav Dance) पर रोक लगा दिया गया था। ऐसे में 18 साल बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने आनंद मार्गियों को जुलूस निकालने और तांडव नृत्य की इजाजत क्यों नहीं थी?

उस समय भी मसला ‘अनिवार्य अंग’ का था
जैसे इस समय हिजाब को इस्लाम का अंग बताया जा रहा है, उसी तरह तांडव को आनंद मार्गियों ने धार्मिक अनुष्ठान का अनिवार्य हिस्सा बताया था। दरअसल, आनंद मार्ग संप्रदाय की स्थापना 1955 में हुई थी। शैव संप्रदाय से जुड़े आनंद मार्गियों को 2004 में बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि उन्हें सार्वजनिक रूप से खोपड़ी और त्रिशूलों के साथ तांडव नृत्य करने की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि यह उसके पंथ का अनिवार्य अंग नहीं है।

आनंद मार्ग के उस दावे को भी सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया था कि उसके संस्थापक पीआर सरकार ने 1966 में विशेष मौकों पर सार्वजनिक जुलूस में नृत्य करने का निर्देश दिया था। तब तीन जजों की बेंच ने 2-1 से यह फैसला दिया था। इससे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने पब्लिक में तांडव करने पर पाबंदी लगा दी थी।

2004 में सुप्रीम कोर्ट ने 1983 के शीर्ष अदालत के फैसले पर सहमति जताते हुए कहा था कि सार्वजनिक रूप से तांडव नृत्य करना आनंद मार्गी पंथ का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने 1990 के कोलकाता हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि पब्लिक में खोपड़ी और त्रिशूल लेकर तांडव नृत्य करना आनंद मार्गियों के पंथ का अनिवार्य हिस्सा है और पुलिस कमिश्नर इस पर शर्तें नहीं थोप सकते।

1955 में पंथ बना तो 66 में रूल क्यों?
दरअसल, संस्थापक की ओर से 1966 में तांडव नृत्य का निर्देश देने के बाद कोलकाता पुलिस ने सीपीसी की धारा 144 के तहत इसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी। फैसले को 1983 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और फैसला आया कि यह आनंद मार्गी आस्था का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। पांच साल के बाद 1988 में आनंदमूर्ति जी के उपदेशों का संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ और उसमें तांडव नृत्य के सार्वजनिक प्रदर्शन की बात कही गई। जब पुलिस ने दोबारा परमिशन देने से मना कर दिया तो पंथ के लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए।

जब आर्टिकल 25 और 26 का हवाला देते हुए मौलिक अधिकारों की दलील दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि धर्म के अनिवार्य अंग का मतलब होता है जिस पर धर्म की स्थापना की गई हो, यानी उसका मूल आधार। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तांडव नृत्य मूल रूप से आनंद मार्गियों के लिए अनिवार्य नहीं था, इसे आनंद मार्ग के संस्थापक ने 1966 में धार्मिक अनुष्ठान का जरूरी हिस्सा बनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘आनंद मार्ग हाल में बना एक संप्रदाय है और तांडव नृत्य उसके धार्मिक संस्कारों में काफी बाद में जोड़ा गया। ऐसे में यह संदिग्ध है कि तांडव नृत्य को आनंद मार्गियों के धार्मिक अनुष्ठान का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।’

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