नई दिल्ली
अगर कोई आपसे पूछे की देश में सबसे ज्यादा करोड़पति किस शहर में होंगे, तो आपके दिमाग में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों का नाम आएगा। लेकिन क्या आपको पता है देश में एक ऐसा गांव भी है, जिसमें रहने वाले करीब सभी लोग करोड़पति हैं। आपको सुनकर शायद यकीन न हो, लेकिन ये सच है। आज हम आपको इसी गांव के बारे में बताने जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस गांव के लोग पहले से ही अमीर हों। यहां के लोगों ने अपनी मेहनत के दम पर ये दौलत हासिल की है। चलिए आपको बताते हैं इस गांव के बारे में।
जानिए कहां पर है ये गांव
यह गांव, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में पड़ता है। इसका नाम है हिवरे बाजार। इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। साल 1990 में यहां 90 फीसदी गरीब परिवार रहते थे। यहां पर पीने के लिए भी पानी नहीं था। लेकिन, गांव की किस्मत बदल गई है। इस कामयाबी की कहानी दिलचस्प है। इस गांव में महज 305 परिवार रहते हैं। इनमें से 80 फीसदी से ज्यादा करोड़पति हैं। इस गांव की एक दिलचस्प बात ये भी है कि यहां पर एक भी मच्छर नहीं है। इस गांव में न पानी की कमी है और न हरियाली की। गर्मियों में इस गांव का तापमान आसपास के गांवों के मुकाबले 3-4 डिग्री कम होता है।
लाखों रुपये कमाते हैं लोग
गांव में 50 से ज्यादा परिवारों की वार्षिक आय 10 लाख रुपए से ज्यादा है। गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के शीर्ष 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है। साल 1995 में 180 में से 168 परिवार गरीबी रेखा के नीचे थे। वहीं साल 1998 के सर्वेक्षण में यह संख्या 53 हो गई। अभी यहां केवल तीन परिवार इस श्रेणी में हैं। गांव ने गरीबी रेखा के लिए अपने अलग मानदंड तय किए हैं, जो लोग इन मानदंडों में प्रति वर्ष 10 हजार रु. भी नहीं खर्च कर पाते वे इस श्रेणी में आते हैं। ये मापदंड आधिकारिक गरीबी रेखा से लगभग तीन गुना हैं।
गांव के सरपंच ने बदली तस्वीर
पहले इस गांव में भी गरीबी थी। लोग परेशान रहते थे। गांव में पर्याप्त पानी तक नहीं था। लेकिन इस गांव के सरपंच पोपट राव पवार का नाम देश के उन लोगों में गिना जाता है जिन्होंने अपनी बदौलत पूरे गांव की तस्वीर बदल दी। आसपास के लोग अब उनसे सीख लेकर खेती-किसानी में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। दशकों पहले हिवरे बाजार भी दूसरे गांवों की तरह खुशहाल था। 1970 के दशक में ये गांव अपने हिंद केसरी पहलवानों के लिए प्रसिद्ध था। मगर हालात बिगड़े और बिगड़ते चले गए। हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर सूखे से जूझा। यहां पीने के लिए पानी नहीं बचा। कुछ लोग अपने परिवारों के साथ पलायन कर गए। गांव में महज 93 कुंए थे. जलस्तर भी 82-110 फीट पर पहुंच गया। लेकिन, फिर लोगों ने खुद को बचाने की कवायद शुरू की।
इस तरह गांव में हुआ विकास
साल 1990 में एक कमेटी ‘ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी’ बनाई गई। इसके तहत गांव में कुंए खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया। इस काम में, महाराष्ट्र एम्प्लायमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी। इसके बाद कमेटी ने कुछ सख्त कदम उठाए। कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी। अब गांव में जलस्तर 30-35 फीट पर आ गया है। वहीं गांव में अब 340 कुंए हैं।
