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हमेशा के लिए नहीं हो सकता आरक्षण, समय सीमा तय करने की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली

सामान्य वर्ग के गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक नसीहत भी दी है। जी हां, देश की सबसे बड़ी अदालत ने सोमवार को जोर देकर कहा कि कोटा सिस्टम के लिए एक समयसीमा तय करने की जरूरत है और ये हमेशा के लिए नहीं रह सकता। आरक्षण का मकसद सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन यह अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रहना चाहिए जिससे यह निहित स्वार्थ न बन सके। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में दाखिले और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन की वैधता को 2 के मुकाबले 3 मतों के बहुमत से बरकरार रखा है।

EWS आरक्षण के दायरे में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के गरीब नहीं आएंगे। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह भेदभाव वाला नहीं है और संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन भी नहीं करता है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जे बी पारदीवाला ने कानून को बरकरार रखा, जबकि चीफ जस्टिस यूयू ललित ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन इस पीठ की अध्यक्षता करते हुए जस्टिस एस रवींद्र भट के साथ खिलाफ में रहे।

जस्टिस त्रिवेदी और जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि कुछ समय के बाद ये तरजीही व्यवस्था हटाई जानी चाहिए। जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, ‘संविधान निर्माताओं ने क्या सोचा था, 1985 में संविधान पीठ ने क्या प्रस्ताव दिया था और संविधान के लागू होने के 50 साल के बाद क्या हासिल करना चाहते थे, वह था कि आरक्षण नीति की एक अवधि होनी चाहिए जिसे आज आजादी मिलने के 75 साल बाद भी हासिल नहीं किया जा सका है।’ उन्होंने आगे कहा कि यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत में प्राचीन समय से चली आ रही जातिगत व्यवस्था देश में आरक्षण प्रणाली के लिए जिम्मेदार है। इसे एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के लोगों के साथ हुए अन्याय को सुधारने और अगड़े वर्ग से जुड़े लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए समान अवसर मुहैया कराने के लिए लाया गया था।

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा कि लेकिन हमारी आजादी के 75 साल होने के बाद अब हमें समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण प्रणाली पर फिर से विचार करने की जरूरत है।जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि आरक्षण का मतलब सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है और निहित स्वार्थ बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। शिक्षा और विकास के लाभ का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि भारी संख्या में बैकवर्ड क्लास के लोग शिक्षा और रोजगार पा रहे हैं। ऐसे में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ऐसे लोगों को बैकवर्ड श्रेणी से हटाया जाना चाहिए जिससे क्लास के उन लोगों पर ध्यान दिया जा सके जिन्हें वास्तव में मदद की जरूरत है।

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