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पाक राष्ट्रपति का ‘फॉर्म्‍युला 4’… क्या वाकई कश्मीर मुद्दे पर अटल-मुशर्रफ के बीच बन गई थी बात?

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नई दिल्ली

भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर काफी बात होती है। बीच-बीच में बातचीत की दुहाई दी जाती है लेकिन भारत की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि बिना आतंकवाद पर लगाम लगाए यह संभव नहीं है। वहीं पाकिस्तान कश्मीर का राग अलापना नहीं भूलता। इस वक्त जब पाकिस्तान में कंगाली की हालत है उस वक्त भी उसका रवैया ऐसा ही है। हालांकि पूर्व में ऐसी कुछ कोशिश हुई है जिसमें 2001 की आगरा शिखर वार्ता का जिक्र जरूर होता है। कारगिल युद्ध के करीब दो साल बाद जब 2001 में परवेज मुशर्रफ भारत आए तो उस वक्त भी कारगिल युद्ध के घाव ताजा थे लेकिन उम्मीद थी कि शायद कड़वाहट कुछ कम हो। इतिहास में आगरा शिखर सम्मेलन को भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर कुछ ऐसे याद किया जाता है कि यह एक बड़ा मौका था जब बात बनते-बनते रह गई। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी किताब ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा है कि कश्मीर का समाधान दोनों सरकारों के हाथ में है और इसको करना चाह रही थीं। फिर सवाल यह भी समाधान हुआ क्यों नहीं। इस बातचीत में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने चार सूत्री समाधान का प्रस्ताव रखा था।

1. मुशर्रफ की योजना के जो चार बिंदु थे उसमें पहला था कि एलओसी के दोनों ओर लाखों सैनिक कश्मीर में तैनात हैं। मुशर्रफ के प्रस्ताव के अनुसार भारत और पाकिस्तान दोनों स्थायी शांति के लिए अपने सैनिकों को वापस करना होगा। यह चरणबद्ध वापसी होगी या कुछ और इस पर दोनों पक्षों को विचार करने की जरूरत है।

2. कश्मीर की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि, जम्मू और कश्मीर के लोगों को नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति होगी। यदि मुशर्रफ की योजना को भारत स्वीकार करता तो भारत को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (जिसे पाकिस्तान अपने आजाद कश्मीर प्रांत के रूप में दिखाता) पर पाकिस्तान की संप्रभुता को स्वीकार करना होता और बदले में पाकिस्तान भारत की ओर से जम्मू और कश्मीर के हिस्से पर भारतीय आधिपत्य को स्वीकार करेगा।

3. पाकिस्तान लंबे समय से ‘कश्मीरियों के आत्मनिर्णय’ का हिमायती रहा है, लेकिन मुशर्रफ अधिक स्वायत्तता के पक्ष में इसे छोड़ने को तैयार थे। इस प्रस्ताव का एक मतलब यह भी था कि जम्मू-कश्मीर में 370 हमेशा के लिए रहता और भारतीय जनता पार्टी जो शुरू से इसे खत्म करने बात करती थी उसे इस मुद्दे को छोड़ना पड़ता।

4. भारत, पाकिस्तान और कश्मीर को शामिल करते हुए जम्मू और कश्मीर में एक संयुक्त पर्यवेक्षण तंत्र। इसमें मुशर्रफ का जोर स्थानीय कश्मीरी नेतृत्व को शामिल करने का था। शिखर सम्मेलन के विफल होने के कई वर्षों बाद मुशर्रफ ने दावा किया था कि भारतीय पक्ष समझौते से पीछे हट गया था, जबकि मसौदा प्रस्ताव हस्ताक्षर के लिए तैयार था। मुशर्रफ ने 2004 में एक कार्यक्रम में कहा था मुझे बताया गया कि भारतीय कैबिनेट ने अपनी मंजूरी देने से इस पर इनकार कर दिया था।

5 साल बाद वार्ता का जिक्र मुशर्रफ ने कुछ ऐसे किया
वार्ता के 5 साल बाद 2006 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपनी आत्‍मकथा ‘इन द लाइन ऑफ फायर’ लिखी तो इस वाकये का जिक्र कुछ यूं किया, ‘रात करीब 11 बजे भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी से मुलाकात हुई। माहौल गंभीर था। मैंने उन्‍हें दो टूक शब्‍दों में कह दिया कि ऐसा लगता है कि कोई ऐसा शख्‍स है जो हम दोनों के भी ऊपर है और जिसके आगे हम दोनों की ही नहीं चली। इससे हम दोनों ही शर्मिंदा हुए हैं।

आडवाणी ने माई कंट्री माई लाइफ में ल‍िखा है कि जनरल ने मेरा नाम तो नहीं लिया था लेकिन इशारा मेरी तरफ था। अटल बिहारी वाजपेयी ने मुशर्रफ के बयान को सरासर झूठ बताया और कहा कि उनका अड़‍ियल रवैया, कश्‍मीर में आतंकवाद को आजादी की लड़ाई साबित करने की कोशिश ही आगरा समझौते को विफल करने में अहम साबित हुई।

आडवाणी के सवाल ने उड़ा दिया मुशर्रफ के चेहरे का रंग
लाल कृष्ण आडवाणी ने आगरा शिखर वार्ता से पहले ही मुशर्रफ से ऐसा सवाल पूछ लिया जिससे उनके चेहरे का रंग उड़ गया था। दोनों देशों के बीच प्रत्‍यर्पण संधि होनी चाहिए और इस पर मुशर्रफ का कहना था हां। इतने में आडवाणी कह उठे औपचारिक तौर पर यह संधि लागू हो इससे पहले अगर आप 1993 के मुंबई बम धमाकों के जिम्‍मेदार दाऊद इब्राहिम को भारत सौंप दें तो शांति प्रक्रिया आगे बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी। यह सुनने के बाद मुशर्रफ के चेहरे का रंग बदल गया था।

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